२८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प ते आगंतुक भाव छे. ते रागने अहीं अचेतन कहीने अनुभव कराववामां एटले ज्ञान कराववामां समर्थ एटले निमित्त छे एम कह्युं छे. ज्ञान तो स्वयं पोताथी थाय छे तेमां रागादि भाव निमित्त छे एम कह्युं छे. राग ज्ञानने करे के ज्ञान रागने करे एवी वस्तु नथी. भगवान आत्मा रागथी भिन्न पडीने ज्यां ज्ञानमय थयो त्यां ते कर्मचेतना अने कर्मफळचेतनाना परिणाम ज्ञानमां (ज्ञेयपणे) निमित्त छे.
पोतानुं जे स्वपरप्रकाशक ज्ञान परिणम्युं ते ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे अने परथी- रागादिथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. तथा पर्यायमां जे रागादि परिणाम थया ते पुद्गलथी अभिन्न छे अने आत्माथी सदाय अत्यंत भिन्न छे. अहा! जेम करवतथी बे कटका करे तेम अहीं ज्ञान अने राग वच्चे भेदज्ञान करीने बे कटका करवानी वात छे. रागादि परिणाम ज्ञानमां निमित्त छे एनो अर्थ शुं? एनो अर्थ एटलो के ज्ञान पोताथी स्वपरप्रकाशकपणे परिणमे छे एमां ते रागादि भावो परज्ञेयपणे निमित्त छे. त्यां राग छे तो अहीं ज्ञान परिणम्युं छे एम नथी. आत्मा ज्ञान करवामां स्वतंत्र छे. राग थयो माटे रागनुं ज्ञान थयुं एम छे नहि. रागना निमित्ते थतुं ते प्रकारनुं ज्ञान आत्माथी अभिन्नपणाने लीधे पुद्गलथी (रागथी) सदाय अत्यंत भिन्न छे.
जुओ आ परमात्मानी वाणी! संतोनी वाणी! संतोनी वाणी ए परमेष्ठीनी वाणी छे. आचार्य पण परमेष्ठी छे ने! धवलमां ‘‘णमो लोए त्रिकालवर्ती सव्व अरिहंताणं’’ इत्यादि- एवो पाठ छे. त्रिकाळवर्ती पंचपरमेष्ठीना अस्तित्वनो स्वीकार करीने तेमने नमस्कार करवानो जे राग थयो ते पुद्गलना परिणाम छे एम अहीं कहे छे. अने ते पुद्गलपरिणाम ज्ञान कराववामां निमित्तरूपे समर्थ छे, पण छे तो ए पुद्गलपरिणाम, अने ते पुद्गलथी अभिन्न छे. तेनुं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे अने ते रागना परिणामथी अत्यंत भिन्न छे.
परद्रव्यने नमस्कारनो भाव ए राग छे, विकल्प छे. स्वना अनुभवमां लीन थवुं, स्वमां नमवुं ए निश्चय नमस्कार छे. स्वाश्रये निर्विकल्पदशा प्रगट करवी ते भावनमस्कार छे. पंचपरमेष्ठीनी वंदनानो जे विकल्प थयो ते कर्मचेतना छे. पंचपरमेष्ठीनी वंदनाना भावमां जे हरख आवी गयो ते कर्मफळचेतना छे. आ कर्मचेतना अने कर्मफळचेतनाना परिणाम पुद्गलथी अभिन्न छे. अने ते प्रकारना ज्ञानथी ते परिणाम अत्यंत भिन्न छे. अहा! गजब वात छे!
प्रभु! तारी ऋद्धि तो देख! रागनुं ज्ञान करवा तुं समर्थ छो पण राग करे एवी तारी शक्ति नथी, केमके रागनी तारामां नास्ति छे. आ लीमडाना एक पांदडामां असंख्य शरीर छे अने एक शरीरमां एकेक जीव छे. एम ठसाठस जीव भर्या छे. दरेकना कार्माण अने तैजस शरीर भिन्न छे. आवा जीवोना अस्तित्वनो ज्ञानी ज स्वीकार करी शके. (अज्ञानीने एनो स्वीकार होतो नथी). अहा! आम असंख्य जीवो भीडमां