समयसार गाथा-९३ ] [ २९ भींसाईने पडया छे! एक राई जेटली बटाटानी कटकीमां निगोदना जीवोनां असंख्य औदारिक शरीर छे. अने प्रत्येक शरीरमां अनंत एकेन्द्रिय जीवो छे. दरेकना परिणाम भिन्न छे. कोई जीवना परिणाम कोई अन्य जीवने स्पर्शता नथी. अरे प्रभु! तारा ज्ञाननी गंभीरता तो देख! ज्ञान तेने स्वीकारे छे अने ते वस्तु ज्ञानमां निमित्त पण छे. पण तेने स्वीकारतुं ज्ञान पोते पोताथी थयुं छे, पर निमित्तथी थयुं छे एम नथी.
अहाहा...! कहे छे के राग-द्वेष सुख-दुःखादि अवस्था पुद्गलना परिणाम छे. गजब वात छे ने! जे भावथी तीर्थंकरगोत्र बंधाय ए भाव पुद्गलनी दशा छे, केमके तेना निमित्ते पुद्गलकर्म बंधाय छे, तेनाथी पुद्गलनो संयोग थाय छे. ते भाव आत्मभाव नथी तेथी पुद्गलपरिणाम छे. ज्ञानीने तीर्थंकरगोत्रबंधना कारणरूप जे शुभराग आव्यो ते राग ज्ञानमां निमित्त थाय छे. ते शुभराग संबंधी तेने जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे अने पुद्गलथी-ते शुभरागथी अत्यंत भिन्न छे. अहो! ज्ञाननी पर्यायनो अनंतना अस्तित्वने (अनंतपणे) जाणे एटलो विषय छे छतां परपदार्थ अने राग छे तो ज्ञान जाणे छे एम नथी.
प्रश्नः– शास्त्रमां आ बधी वात छे तो ज्ञान थाय छे ने?
उत्तरः– ना; ज्ञान पोताथी थाय छे. शास्त्रथी थतुं नथी. वळी परने जाणतां जे विकल्प थाय छे ते विकल्प ज्ञानथी भिन्न छे. माटे ते विकल्पथी ज्ञान थाय छे एम नथी.
आवो वीतरागनो मार्ग छे. केटलाक कहे छे समन्वय करो. पण वीतराग धर्मनो कोई साथे समन्वय थई शके एम नथी. कोईनी साथे विरोध के द्वेषनी आ वात नथी. पण कोई साथे समन्वय थाय एवो आ मार्ग नथी. अहा! जे वडे तीर्थंकरगोत्र बंधाय एवो जे राग तेनी साथे पण ज्ञानने एकता नथी. लोकोने एम लागे के तीर्थंकरगोत्र बांध्युं अने ते जीव तीर्थंकर थशे. परंतु तीर्थंकर थशे ए तो पोताना कारणे थशे. रागनो भाव आवतां तीर्थंकरगोत्र बंधाई जाय छे. परंतु पछी स्वनो आश्रय लेतां समस्त राग तूटशे त्यारे केवळज्ञान थतां तीर्थंकरगोत्रनो उदय आवशे. (एमां रागनुं अने कर्मनुं शुं कर्तव्य छे?)
राग मारो अने हुं एनो कर्ता एवी कर्ताबुद्धिथी अज्ञानी जीव दुःखीदुःखी छे. भगवान आत्मा आनंदनो नाथ आनंदमूर्ति प्रभु छे. तेने भूली राग मारो छे एम माननार अज्ञानी जीव चारगतिमां रखडतां महादुःखी छे, केमके राग दुःख छे. अहीं कहे छे ज्यां भेदज्ञान थयुं त्यां रागना परिणाम-दुःखना परिणाम पुद्गल साथे अभिन्न छे; अने ते रागपरिणामना निमित्ते ते प्रकारनुं जे ज्ञान थयुं ते आत्माथी अभिन्न छे अने रागथी भिन्न छे. तथा जे रागना परिणाम थया ते पुद्गलथी अभिन्न छे अने ज्ञानथी भिन्न छे. आवुं भेदज्ञान ज्यांसुधी करशे नहि त्यांसुधी भूलो पडेलो भगवान चार-गतिमां आथडशे.