Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

लोको बिचारा वेपारधंधामां रळवा कमावामां गरी गया होय तेमने आ नक्की करवानी कयां फुरसद छे? पण दुःखथी बचवुं होय तो आ समज्या विना छूटको नथी, भाई! आ खेती नथी करता? खेतीमां बाजरी, जुवार, कपास वगेरे मोल पाके तेने जोईने खूब हरखाई जाय, राजी राजी थई जाय. गुजरातमां कपास ढगलाबंध पाके तो कहे के-काचुं सोनुं पाकयुं छे. अरे भाई! खेतीनो मोल छे ए तारी चीज नथी, ए तो परवस्तु छे. ते संबंधीनो जे विकल्प आव्यो ते तीव्र राग-दुःखरूप छे. ते रागना-दुःखना परिणाम निश्चयथी जीवथी भिन्न छे अने तेनुं ज्ञान थयुं ते आत्माथी अभिन्न छे. आ भेदज्ञाननी वात छे, अने ते ज दुःख दूर करवानो उपाय छे.

शीत-उष्णनी माफक पुण्य-पापना भावने अहीं पुद्गलमां नाखी दीधा छे. शीत-उष्ण छे ए परमाणुनी अवस्था छे अने आ रागद्वेष तो जीवनी पर्याय छे. तेने अहीं अचेतन कहीने पुद्गलपरिणाम कह्या छे. अचेतन छे पण तेमां स्पर्श, रस, गंध, वर्ण नथी. जडकर्मनी अवस्थामां स्पर्श, रस, गंध, वर्ण छे अने आ रागादि अवस्थामां स्पर्श, रस, गंध, वर्ण नथी. परंतु रागादिनी पर्यायमां ज्ञाननो अंश नथी माटे तेने अचेतन कहीने पुद्गलपरिणाम कह्या छे. अहो! आ समयसार जगतनुं अजोड, अद्वितीय चक्षु छे! भरतक्षेत्रनो भगवान छे! शीत- उष्णनुं पोतामां ज्ञान थाय छे तो ए शीत-उष्ण अवस्थाने ज्ञान कराववामां समर्थ कहेल छे. समर्थनो अर्थ अहीं निमित्त थाय छे. तेम रागद्वेषनी अवस्था ज्ञान कराववामां समर्थ छे एटले निमित्त छे. ज्ञान तो पोताथी थाय छे, निमित्त छे तो ज्ञान थाय छे एम नथी.

मोटां मकान, बंगला होय अने एमां मखमलना गालीचा अने लाखोनुं फर्नीचर होय, पण एमां तारे शुं भाई! ए तो बधी बहारनी धूळ छे अने ते अनंतवार संयोगमां मळी छे. एनी ममताबुद्धि होय तो एमांथी नीकळवुं बहु भारे पडशे भाई! तारे आत्मानी चैतन्यलक्ष्मी जोईती होय तो अहीं कहे छे के जे भावथी तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव अचेतन पुद्गलपरिणाम छे एम नक्की कर. ज्ञानस्वभावनो अभाव छे माटे ते भाव पुद्गलपरिणाम छे. अरे भाई! जे भाव अचेतन छे ते निश्चयनुं कारण केम थाय? चेतननी निर्मळ पर्याय थवामां अचेतन राग कारण थाय एम केम बने? ते भाव ज्ञानमां निमित्त हो, पण एनाथी निश्चय मोक्षमार्ग प्रगटे एम कदीय बने नहि. अचेतन राग कारण अने चैतन्यनी पर्याय कार्य एम कदी होय नहि.

द्रष्टिनी अपेक्षाए तो स्वानुभवनी जे निर्विकल्प दशा ए पण जीव नथी. ए दशा तो जीवनो पर्यायभाव छे. पर्यायनो भाव छे ते त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यमां नथी. सम्यग्दर्शननो विषय तो त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य छे. सम्यग्दर्शननी पर्याय के मोक्षमार्गनी पर्याय ते सम्यग्दर्शननो विषय नथी. मोक्षमार्गनी पर्याय ते मोक्षमार्गनो विषय नथी. अनुभूतिनी पर्याय त्रिकाळी ध्रुव सामान्यने विषय करे छे. आवुं वस्तुस्वरूप छे.