Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९३ ] [ ३१

प्रश्नः– व्यवहाररत्नत्रयने परंपरा कारण कह्युं छे ने?

उत्तरः– हा, व्यवहाररत्नत्रयनो शुभराग ज्ञानीने मोक्षनुं परंपरा कारण व्यवहारथी कहेल छे. एनो अर्थ ज ए थयो के व्यवहाररत्नत्रय मोक्षमार्गनुं वास्तविक कारण नथी. रागथी भिन्न पडीने पोताना ज्ञायकस्वरूपनो जेने अनुभव थयो छे एवा समकिती धर्मी जीवने शुभना काळे अशुभ टळे छे अने स्वाश्रये तेने शुभ टळीने शुद्ध दशा प्रगट थशे ए अपेक्षाए ज्ञानीना व्यवहाररत्नत्रयने मोक्षनुं परंपरा कारण व्यवहारथी कहेल छे.

यथार्थ सिद्धांत आ एक ज छे के व्यवहारथी निश्चय न थाय, केमके व्यवहारनो शुभराग अचेतन छे, पुद्गलना पीरणामरूप छे. ते भगवान चैतन्यस्वरूप आत्मानी निर्मळ परिणतिनुं कारण थाय एम बनी शके नहि. ते ज्ञानमां निमित्त छे अने ज्ञान तेनुं जाणनार छे; एवुं ज्ञाननुं स्वपरप्रकाशक सहज सामर्थ्य छे. हवे कहे छे-

‘ज्यारे ज्ञानने लीधे आत्मा ते राग-द्वेष-सुख-दुःखादिनो अने तेना अनुभवनो परस्पर विशेष जाणतो होय त्यारे, तेओ एक नथी पण भिन्न छे एवा विवेकने लीधे, शीत- उष्णनी माफक, जेमना रूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे एवां रागद्वेषसुख-दुःखादिरूपे अज्ञानात्मा वडे जराय नहि परिणमतो थको, ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करतो, पोते ज्ञानमय थयो थको, ‘‘आ हुं (रागने) जाणुं ज छुं, रागी तो पुद्गल छे (अर्थात् राग तो पुद्गल करे छे)’’ इत्यादि विधिथी, ज्ञानथी विरुद्ध एवा समस्त रागादि कर्मनो अकर्ता प्रतिभासे छे.’

भेदज्ञान थवाथी धर्मी जीव रागद्वेष, सुखदुःखनी कल्पना अने ज्ञान ए बे वच्चेनुं परस्पर अंतर जाणे छे. जुओ, सुंदर युवान स्त्रीने देखी अज्ञानी राग करे छे अने तेमां आनंद माने छे. ज्यारे ज्ञानीने एवा प्रसंगमां राग थाय तेनो खेद थाय छे. खरेखर ज्ञानीने तो ए राग ज्ञानमां निमित्त छे. ज्ञानी तो जाणे छे के आ राग दुःखरूप छे. इन्द्रियोना विषयोथी निवृत्त न होय एवा ज्ञानीने चारित्रना दोषथी राग आवे छे. पांचमा गुणस्थान सुधी रौद्रध्यान पण थाय छे. परंतु रौद्रध्यानना परिणाम ज्ञान कराववामां निमित्त छे.

आवी वात लोकोने सांभळवा मळी नथी एटले नवी लागे छे. पण आ कांई नवी नथी. अनादिथी मार्ग चाल्यो आवे छे ते ज आ वात छे. अरे प्रभु! तुं चैतन्यनो नाथ छो; तेने तारी पर्यायमां पधराव ने! भगवान! एमां तारी शोभा छे अने एमां तने आनंद थशे. भगवानने तुं अंतरमां बेसाड. अज्ञानीने अनादिथी पर्याय उपर द्रष्टि छे तेथी तेने शुद्ध चैतन्यतत्त्वनो-त्रिकाळी द्रव्यनो महिमा आवतो नथी. पण प्रभु! तुं शुद्ध चेतनासिंधु ज्ञाननो दरियो छुं. तेमांथी तो ज्ञाननी पर्याय उछळे. नदीमां तरंग ऊठे तो पाणीना तरंग ऊठे, कांई रेतीना तरंग ऊठे? तेम