Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प ज्ञाननो दरियो प्रभु आत्मा छे. तेमां तो ज्ञाननी पर्यायना कल्लोलो ऊछळे; तेमांथी रागनी पर्याय न ऊछळे. आवुं ज वस्तुनुं स्वरूप छे.

सूक्ष्म तो छे प्रभु! पण शुं थाय? मार्ग तो आ छे. अनंत तीर्थंकरोए कह्यो ते मार्ग दिगंबर संतोए जगत समक्ष जाहेर कर्यो छे. संतो भगवानना आडतिया थईने आ माल तारा माटे लाव्या छे. प्रभु! तारी महत्ता तो तुं देख! जगतमां अनंता रजकण अने अनंता जीव छे. प्रत्येक रजकण अने प्रत्येक जीव प्रत्येक समये अनंत गुण-पर्याय सहित छे. तेनी सत्तानो स्वीकार करे तेवी ज्ञाननी एक समयनी पर्यायनी अद्भुत ताकात छे.

जेनी एक समयनी ज्ञाननी पर्यायनुं आवुं अचिंत्य सामर्थ्य छे, ते आत्मा तो त्रिकाळी ज्ञाननो पिंड प्रभु छे. द्रष्टि अपेक्षाए तो एक समयनी पर्याये नथी तेवो एकलो परम- पारिणामिकभावरूप तेनो स्वभाव छे. औदयिक आदि जे चार भावो छे तेमां कर्मना सद्भावनी वा अभावनी अपेक्षा आवे छे. पांचमो पारिणामिक भाव छे ते परम निरपेक्ष छे. तेमां निमित्तनी अपेक्षा नथी. आवा स्वभावनुं भान थईने जेने भेदज्ञान थयुं ते धर्मीने, ज्ञान पर्यायमां सहज स्वपरप्रकाशक सामर्थ्य प्रगटे छे. तेने तीर्थरक्षानो जे अनुराग थाय ते राग तेना ज्ञानमां निमित्त छे. ते राग पुद्गल साथे अभिन्न छे अने ते संबंधी जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान आत्माथी अभिन्न छे. ज्ञानीने जे अनुराग थयो ते जाणेलो प्रयोजनवान छे बस.

ज्ञानीने दया, दान, व्रत आदिनो राग हो; ए राग आवे ते कांई धर्म नथी. ए राग तो ज्ञानमां जाणवालायक छे. ए राग ज्ञानथी भिन्न छे अने पुद्गलथी अभिन्न छे. निश्चयथी आत्मानो ज्ञायकस्वभाव छे. तेनी अनंत शक्तिनो शुद्ध अने पवित्र छे. पवित्रतापणे परिणमवुं ते शकय छे पण राग अने विकार के जे पुद्गलपरिणाम छे ते-रूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे.

मुनिदशामां जे पंचमहाव्रतादिनो राग आवे छे ते द्रव्यलिंग छे. जेम नग्नदशा ए जडनी दशा छे अने ते द्रव्यलिंग छे तेम पंचमहाव्रतादिना परिणाम पण द्रव्यलिंग छे. ते आत्मानी पर्याय नथी. ते द्रव्यलिंगपणे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे. गजब वात छे! भाई! आ समजवा माटे खूब धीरज जोईए. अने समजीने अंतर्मुख थवामां अनंतगुणो पुरुषार्थ जोईए. अहो! आचार्यदेवे केवी अलौकिक वात करी छे!

रागथी भिन्न पडीने स्वभावसन्मुख थवुं अने स्वभावने (रागथी) अधिक जाणवो ते सम्यग्ज्ञान छे. चैतन्यस्वभावथी विभावने अधिक-भिन्न जाणवो ते आत्मानो मार्ग छे. गाथा १७-१८मां आवे छे के आ बाळगोपाळ सौने ज्ञानमां पोतानो आत्मा जणाई रह्यो छे. ज्ञाननी पर्यायनो स्वपरप्रकाशपणानो स्वभाव छे. तेथी ज्ञाननी पर्यायमां पोतानो द्रव्यस्वभाव अनुभववामां-जाणवामां आवे छे. परंतु अज्ञानीनी द्रष्टि