समयसार गाथा-९३ ] [ ३३ पोताना त्रिकाळी द्रव्यस्वभाव उपर जती नथी. राग अने व्यवहार उपर एनी द्रष्टि रहेली छे. तेथी ‘आ रागने हुं जाणुं छुं’ एम भ्रान्तिथी ते जाणे छे.
अहीं तो ज्ञानीनी वात छे. धर्मी-समकितीनी द्रष्टि द्रव्यस्वभाव उपर स्थिर थई गई छे. तेथी ते ज्ञानस्वभावरूपे परिणमे छे. ते रागनी परिणतिथी भिन्नपणे परिणमे छे. आ शरीर तो जड माटी छे, मसाणनां हाडकां छे. अने अंदर जे शुभराग अने पुण्यना परिणाम थाय ते पुद्गलपरिणाम छे एम ज्ञानी जाणे छे. कोईने बेसे न बेसे ते जुदी वात छे, परंतु राग ते पुद्गलना परिणाम छे केमके ते ज्ञान साथे तन्मय नथी, पण ज्ञानथी भिन्न छे.
ते ज्ञाननी पर्यायमां पोतानुं द्रव्य जणाय छे. परंतु अज्ञानीनी द्रव्य उपर द्रष्टि नथी. अज्ञानीनी द्रष्टि अनादिथी राग अने पर्याय उपर पडी छे. एटले में दया पाळी, में व्रत कर्यां, में भक्ति करी, पूजा करी एम जाणतो ते पोताने एकलो परप्रकाशक माने छे. स्वपरप्रकाशक ज्ञानने एकलुं परप्रकाशक माने ते मिथ्यात्व छे. रागने मानवो अने स्वभावने न मानवो ते एकान्तमिथ्यात्व छे, मिथ्या भ्रान्ति छे.
अरे प्रभु! तुं कोण छो? अहाहा...! अनंतगुणोथी अविनाभावी ज्ञानस्वरूप आत्मा छो. ज्ञानथी अविनाभावी अनंतगुणनो पिंड प्रभु तुं आत्मा छो. आवा शुद्ध चैतन्यमय आत्मानी जेने द्रष्टि थई छे ते ज्ञानीनुं परिणमन ज्ञानमय छे. तेने जे राग थाय छे तेने ज्ञान जाणे छे एम कहेवुं ए व्यवहार छे. खरेखर पोतानुं ज्ञान थयुं त्यारे ते पर्यायमां स्वपरप्रकाशकपणानुं सामर्थ्य प्रगट थयुं तो राग ज्ञानमां जणाई जाय छे. ज्ञान रागने जाणे छे ए उपचार कथन छे. वास्तविक तो ए छे के स्वपरप्रकाशक पर्यायने पोते जाणे छे.
ज्ञान अने राग एक समयमां एक साथे उत्पन्न थाय छे. त्यां हुं रागस्वरूप छुं एम अज्ञानी मानी ले छे. मोक्षमार्गप्रकाशकमां (चोथा अधिकारमां) कह्युं छे के-जे समये ज्ञान उत्पन्न थाय छे ते समये राग उत्पन्न थाय छे. बन्नेनो एक काळ छे. तो अज्ञानीने एम भासे छे के राग मारी चीज छे. बेना भाव भिन्न छे एवुं तेने भान नथी.
अहो! कुंदकुंदाचार्यदेवे जगतने न्याल करी दीधुं छे. तेओश्री विदेहमां साक्षात् सदेहे पधार्या हता. आ वात पंचास्तिकाय, षट्पाहुड अने दर्शनसार-आ त्रणे शास्त्रोमां छे. भगवान कुंदकुंदाचार्य विदेहक्षेत्रमां सीमंधरभगवानना समोसरणमां गया हता अने त्यांथी आवीने आ समयसार आदि शास्त्रोनी रचना करी छे. आ वात प्रमाणभूत अने परम सत्य छे.