३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
अहीं कहे छे-रागथी भिन्न पडीने जेणे भेदज्ञान प्रगट कर्युं छे ते ज्ञानी राग- द्वेषसुखदुःखादि अने तेना अनुभवनो परस्पर विशेष जाणे छे, परस्पर बन्नेनुं अंतर जाणे छे. पोतानो स्वभाव ज्ञान छे अने रागनो स्वभाव जडपणुं छे; पोते आत्मा त्रिकाळ सत्तारूप छे अने राग एक समयनुं अस्तित्व छे, पोते नित्यानंदस्वरूप प्रभु छे अने राग दुःखरूप छे-आ प्रमाणे ज्ञानी परस्पर बन्नेनुं अंतर जाणे छे. अहाहा...! रागथी भिन्न भगवान आत्माने ज्यां स्वलक्षे अनुभव्यो त्यां ज्ञान रागथी भिन्न पडी गयुं. आनुं नाम भेदज्ञान अने आ सम्यग्दर्शन छे.
आमां वादविवाद करे अने सत्यने असत्य करीने स्थापे अने असत्यने सत्य करीने स्थापे एना फळमां दुःख थशे. दुःखना संयोगो बहु कठण पडशे भाई! राग अने भगवान आत्मा एक नथी. जेम अडदनी दाळ अने उपरनुं फोतरुं एक नथी एम आत्मा अने राग एक नथी. भगवान आत्मा एकला आनंदनुं दळ छे अने राग फोतरा समान छे. बन्ने भिन्न छे. आत्मानी ज्ञानपर्याय अने ते ज काळे उत्पन्न थयेली जे रागनी पर्याय ते बन्नेनुं परस्पर अंतर जाणतो ज्ञानी परने पोतारूप जाणतो नथी अने पोताने पररूप जाणतो नथी. रागथी द्रष्टि उठावी लीधी अने भगवान आत्मा उपर द्रष्टि स्थापी एनुं नाम विवेक एटले भेदज्ञान छे, अने ते वडे धर्म छे कह्युं छे ने के-
समयसार कळश १३१मां कह्युं छे के-
अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन।।
जे कोई आज सुधी मुक्ति पाम्या ते भेदविज्ञानथी पाम्या छे अने जे कोई बंधाया छे ते भेदविज्ञानना अभावथी बंधाया छे. अहो! भेदज्ञाननो महिमा अपरंपार छे!
कहे छे के-शीत-उष्णनी माफक आत्मा वडे रागद्वेषसुखदुःखादिरूपे परिणमवुं अशकय छे. शीत-उष्ण अवस्था छे ते परमाणुनी अवस्था छे. ते परमाणुथी अभिन्न छे. ते शीत-उष्ण अवस्था आत्मा द्वारा करावी अशकय छे. तेम पुण्यपापना शुभाशुभभावपणे आत्मानुं परिणमवुं अशकय छे, केमके पुण्यपाप आदि भावो अचेतन जड छे अने भगवान आत्मा शुद्ध चैतन्यमय ज्ञायकभावमात्र छे. अहाहा...! आत्मा जे ज्ञायकभावरूप चैतन्यस्वरूप वस्तु छे ते रागद्वेषना अचेतनभावपणे केम परिणमे?
आत्मा शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय इत्यादि परनी क्रियानो कर्ता थाय अने ते परनुं कार्य करे ए वात तो कयांय रही गई. अहीं तो कहे छे के दया, दान, व्रत, भक्ति, पूजा इत्यादि जे विकल्प थाय ते विकल्पपणे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे. पुण्यपापना जे भाव थाय छे ते जड अचेतन छे केमके तेमां चैतन्यनो अंश नथी.