समयसार गाथा-९३ ] [ ३प ७३मी गाथामां कह्युं छे के रागनुं स्वामी पुद्गल छे. त्यां कह्युं छे के-‘‘पुद्गलद्रव्य जेनुं स्वामी छे एवुं जे क्रोधादिभावोनुं विश्वरूपपणुं तेना स्वामीपणे पोते सदाय नहि परिणमतो होवाथी ममतारहित छुं.’’ आम रागनो स्वामी आत्मा नथी, पुद्गल छे एम प्रथम निर्णय कर एम त्यां कह्युं छे. अहीं कहे छे-जेम शीत-उष्णपणे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे. अहाहा...! गजब वात छे! रागपणे परिणमवुं ते आत्मानो स्वभाव नथी. ज्ञान अने आनंदस्वरूपे परिणमवुं ते आत्मानो स्वभाव छे.
पुरुषार्थसिद्धउपाय शास्त्रमां भगवान अमृतचंद्राचार्य देव पोकारीने कहे छे के-जे भावे तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव अपराध छे. रागभाव थाय ते आत्मानी हिंसा छे. जुओ, पांच पांडवो ध्यानस्थ हता. त्यां उपसर्ग थतां नाना बे भाईओ सहदेव अने निकुलने त्रण मोटाभाई (मुनिवरो) प्रत्ये लक्ष गयुं के-अरे! मुनिवरोने आवो उपसर्ग! साधर्मी अने सहोदर प्रत्ये आटलो रागनो ज विकल्प आव्यो ते शुभ विकल्पथी सर्वार्थसिद्धि देवलोकनुं आयुष्य बंधाई गयुं अने केवळज्ञान दूर थई गयुं. त्रण पांडवो तो ध्यानमां लीन थई गया तो केवळज्ञान प्रगट करीने मोक्षपद पाम्या जे विकल्पथी स्वर्गना भवनो बंध थयो अने केवळज्ञान न थयुं ते विकल्पथी लाभ थाय एम केम बनी शके? अनंत तीर्थंकरो, अनंत केवळीओ अने अनंत भावलिंगी संतोए प्रकाशेलो आवो आ वीतराग मार्ग छे.
मंगलं कुंदकुंदार्यो, जैन धर्मोस्तु मंगलं.
जुओ, प्रथम श्री महावीरस्वामी अने बीजा गणधरदेव श्री गौतमस्वामी पछी तरत ज त्रीजा स्थाने भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवनुं नाम आवे छे. जेमणे जैनशासनने जीवित राख्युं छे एवा ए महासमर्थ आचार्यनी आ वाणी छे. तेओ कहे छे के जेमनारूपे आत्मा वडे परिणमवुं अशकय छे एवां रागद्वेषसुखदुःखादिरूपे अज्ञानात्मा वडे जराय नहि परिणमतो थको ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करतो पोते ज्ञानमय थयो थको आ हुं रागने जाणुं ज छुं, रागी तो पुद्गल छे, राग तो पुद्गल करे छे इत्यादि विधिथी, ज्ञानथी विरुद्ध एवा समस्त रागादि कर्मनो अकर्ता प्रतिभासे छे.
९२मी गाथामां ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करतो-एम कह्युं हतुं अने अहीं ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करतो पोते ज्ञानमय थईने, रागनो अकर्ता प्रतिभासे छे एम कह्युं छे. अज्ञान शब्दथी अहीं राग समजवुं. रागमां ज्ञान नथी तेथी तेने अज्ञान कह्युं छे. अज्ञान एटले मिथ्यात्व एम नहि पण अज्ञान एटले राग एम अर्थ समजवो. रागादि अज्ञानपणे परिणमवुं ते अज्ञानात्मा छे अने रागपणे न परिणमतां ज्ञानरूपे परिणमवुं ते ज्ञानात्मा छे. अहो! भगवाननो विरह भूलावे एवी आ वाणी छे.