Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

कहे छे-धर्मीजीव किंचित्मात्र रागपणे परिणमतो नथी. रागमां ज्ञाननो अंश नथी. राग तो अज्ञान छे. अने भगवान आत्मा ज्ञाननी मूर्ति चैतन्यना प्रकाशना नूरनुं पूर छे. ते ज्ञानपणे परिणमे एवो तेनो स्वभाव अने सामर्थ्य छे. धर्मी जीवने द्रव्य-सन्मुखनुं परिणमन थई गयुं छे एटले तेने रागसन्मुखनुं परिणमन छे नहि. जे राग आवे छे तेनो धर्मी जीव ज्ञाताद्रष्टा रहे छे. ज्ञानीने खरेखर ज्ञाताद्रष्टानुं ज परिणमन छे. आ सम्यग्दर्शन अने भेदज्ञाननी वात छे. अने चारित्र! चारित्र तो कोई अलौकिक चीज छे भाई! अहाहा...! सम्यग्दर्शन सहित अंतरमां आनंदनी रमणता एनुं नाम चारित्र छे. एवा चारित्रवंत भावलिंगी मुनिवरोनां दर्शन पण आ काळमां महादुर्लभ थई पडयां छे.

एक वार जंगलमां गया हता त्यां एम थई आव्युं के अहा! कोई भावलिंगी मुनिवर उतरी आवे तो! अहो! ए धन्यदशानां साक्षात् दर्शन थाय तो! अहाहा...! मुनिपद तो परमेश्वर पद छे. नियमसारमां टीकाकार मुनिराज पद्मप्रभमलधारिदेव एक कळशमां (कळश २प३मां) एम कहे छे के मुनिमां अने केवळीमां किंचित् फेर माने ते जड छे. अहाहा...! आवुं मुनिपद ते परमेष्ठीपद छे. पद्मप्रभमलधारिदेव अहींथी वैमानिक देवलोकमां गया छे अने त्यांथी मनुष्यपणामां आवी केवळज्ञान पामीने सिद्धपद पामशे. आवुं अलौकिक छे मुनिपद!

अहीं कहे छे-धर्मीने द्रव्यस्वभावसन्मुखनुं परिणमन थई गयुं छे एटले एनुं ज्ञाताद्रष्टापणे ज परिणमन छे. छेल्ले परिशिष्टमां ४७ शक्तिओनुं वर्णन छे. तेमां अशुद्धपरिणमननी वात ज लीधी नथी. भगवान आत्मा क्रमरूप शुद्धपणे परिणमे छे. त्यां क्रम (पर्याय) शुद्ध अने अक्रम (गुण) शुद्ध-एम कह्युं छे. द्रव्यनी शक्ति शुद्ध छे त्रिकाळी शुद्ध शक्तिवान द्रव्यनी सन्मुख थतां शक्तिनी प्रतीति आवी जाय छे अने तेनी पर्यायमां शुद्धतानो क्रम चालु थई जाय छे. पछी पर्यायना क्रममां अशुद्धता आवे ज नहि. द्रव्यनी शक्तिनुं वर्णन छे एटले द्रष्टिप्रधान कथनमां क्रम निर्मळ छे एम कह्युं छे. प्रवचनसारमां ज्ञानप्रधान कथन छे. त्यां कह्युं छे के मुनिराजने जेटलो राग छे ते परिणमनना ते कर्ता छे. परिणमन छे ए अपेक्षाए त्यां कर्ता कहेल छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षाए कथन होय ते अपेक्षाए यथार्थ समजवुं जोईए.

द्रष्टि अने द्रष्टिनो विषय पवित्र छे तो कहे छे के ज्ञानी किंचित्मात्र रागपणे परिणमता नथी; रागना स्वामीपणे परिणमता नथी, रागथी भिन्नपणे ज्ञाताद्रष्टारूपे परिणमे छे. भगवान आत्मा ज्ञाताद्रष्टा छे अने ते ज्ञानपणे परिणमे ते ज्ञाननुं ज्ञानत्व छे. अज्ञानी रागपणे परिणमे छे ते ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करे छे. आत्मा ज्ञान अने आनंदपणे परिणमे ते ज्ञाननुं ज्ञानत्व छे.

अहीं कहे छे-ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करतो, पोते ज्ञानमय थयो थको, आ हुं