समयसार गाथा-९३ ] [ ३७ रागने जाणुं ज छुं इत्यादि विधिथी रागनो अकर्ता प्रतिभासे छे. ‘पोते ज्ञानमय थयो थको’- एटले राग छे तो रागनुं ज्ञान थयुं छे एम नथी. स्वयं अभेद ज्ञानपणे परिणमतो आ हुं रागने जाणुं ज छुं एम धर्मी माने छे. रागथी लाभ (धर्म) थाय अथवा राग मारुं कर्तव्य छे एम धर्मी जीव मानतो नथी. व्यवहारथी निश्चय थाय ए तो निमित्तनुं ज्ञान कराववा माटे वात करी छे. बाकी रागथी वीतरागता थाय एम कदी होय शके नहि. ज्ञानी तो माने छे के हुं रागने जाणुं ज छुं. (करुं छुं एम नहि).
प्रश्नः- रागने जाणुं पण छुं अने रागने करुं पण छुं एम अनेकान्त करो तो?
उत्तरः- भाई! ए अनेकान्त नथी; हुं रागने एकांते जाणुं छुं अने रागपणे परिणमतो नथी एनुं नाम सम्यक् अनेकान्त छे.
रागी तो पुद्गल छे. व्यवहाररत्नत्रयनो राग पुद्गल छे. रागी तो पुद्गल छे एटले के जीव स्वरूपथी रागी नथी केमके जीव तो चैतन्यस्वरूप छे. रागी तो पुद्गल छे अर्थात् रागनो कर्ता पुद्गल छे इत्यादि विधिथी ज्ञानथी विरुद्ध समस्त रागादि कर्मनो ज्ञानी अकर्ता प्रतिभासे छे. जुओ, आ भेदज्ञाननी विधि! धर्मी रागनुं ज्ञान करे छे ते ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करे छे. राग प्रगट करवो ते आत्मानो स्वभाव नथी. आ प्रमाणे ज्ञानी रागनो अकर्ता प्रतिभासित थाय छे.
‘ज्यारे आत्मा रागद्वेषसुखदुःखादि अवस्थाने ज्ञानथी भिन्न जाणे अर्थात् ‘जेम शीत- उष्णपणुं पुद्गलनी अवस्था छे तेम रागद्वेषादि पण पुद्गलनी अवस्था छे’ एवुं भेदज्ञान थाय, त्यारे पोताने ज्ञाता जाणे अने रागादिरूप पुद्गलने जाणे. एम थतां, रागादिनो कर्ता आत्मा थतो नथी, ज्ञाता ज रहे छे.’
अहो! शुं अलौकिक वातो छे! भाई! बहु धीरजथी आ सांभळवुं जोईए. कहे छे- ज्ञानी रागद्वेष अने सुखदुःखी अवस्थाने ज्ञानथी भिन्न जाणे छे. पोतानी पर्यायमां जे पुण्यपापना भाव अने सुखदुःखनी कल्पना आदि विकारी भाव थाय छे ते पुद्गलनी अवस्था छे अने धर्मी तेने ज्ञानथी भिन्न जाणे छे. परमां सुख छे एवो विकल्प, परमां दुःख छे एवो विकल्प अने पुण्यपापना विकल्प-ते बधाने अहीं पुद्गलनी अवस्था कहेवामां आवी छे. हवे आवी वात कोईने न बेसे तो शुं थाय?
अरे भाई! व्यवहारथी निश्चय थाय एम छे ज नहि. व्यवहार छे खरो; ज्यां सुधी पूर्ण वीतराग थई केवळज्ञान न पामे त्यां सुधी पोताना चारित्रमां अधूराश छे. स्वना आश्रयमां कचाश छे एटले राग आवे छे, देव-गुरु-शास्त्रनी भक्तिनो भाव आवे छे पण ते बधी पोतानी चीज नथी एम वात छे. जे भावथी तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते