Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प भाव पुद्गलनी अवस्था छे एम अहीं कहे छे; केमके शुभरागथी पुद्गलकर्म बंधाय छे अने तेना फळमां पुद्गलना संयोगो मळे छे.

वात तो आ छे पण लोकोने मळी न हती एटले नवी लागे छे; पण आ वात नवी नथी. भाई! आ तो अनादिनी चीज छे अने अनंत तीर्थंकरोए कहेली छे. विभावथी विमुख थई स्वभावसन्मुख थतां रागथी आत्मा भिन्न छे एवुं भेदज्ञान थाय छे. त्यारे ते पोताने ज्ञाता जाणे छे. भेदज्ञान अने सम्यग्दर्शन थया पछी धर्मीने राग आवे छे, सुखदुःखनी कल्पना थाय छे, व्यवहार होय छे पण ते तेनो जाणनार ज्ञाताद्रष्टा कहे छे.

आत्मा सदा वीतरागस्वभावी छे अने वीतरागता प्रगट करवी ते मोक्षमार्ग छे. राग के जे पुद्गलनी अवस्था छे ते वीतरागतानुं कारण केम थाय? अरे! जेने व्यवहारनी यथार्थ समजण नथी तेने निश्चयनी प्राप्ति केम थई शके? निश्चय छे तेने व्यवहार होय छे. ज्ञानीने दया, दान, व्रत, भक्ति, पूजा आदि व्यवहार होय छे पण ए तेनो ज्ञाता-जाणनारो छे. व्यवहार मारो छे एम ज्ञानी मानता नथी. भेदज्ञान थाय त्यारे जीव पोताने ज्ञाता जाणे छे अने रागद्वेषने पुद्गल जाणे छे. राग पोतानी चीज नथी पण पोताथी भिन्न छे एम ते जाणे छे.

अहाहा...! वस्तु चैतन्यस्वभाव ज्ञायकभाव एकला आनंदथी भरेलो छे. आत्मा नित्यानंद, सहजानंद, परमानंदस्वरूप प्रभु छे. तेनुं रागथी भिन्न पडीने जेणे भेदज्ञान कर्युं ते सम्यग्द्रष्टि धर्मात्मा राग अने सुखदुःखनी कल्पनाने ज्ञातापणे जाणे छे, तेने पोतानी चीज अने पोतानुं कर्तव्य मानता नथी.

९२मी गाथामां अज्ञानीनी वात करी छे. अज्ञानी ज्ञाननुं अज्ञानत्व प्रगट करे छे. अहीं गाथा ९३मां ज्ञानीनी वात छे. धर्मी जीव ज्ञाननुं ज्ञानत्व प्रगट करे छे. धर्मी रागनो कर्ता नथी पण ज्ञाताद्रष्टा छे. समकिती चक्रवर्ती राजा होय, लडाईमां पण जाय, तेने लडाईनो विकल्प आवे पण ते विकल्पनो ते ज्ञाता ज रहे छे, कर्ता थतो नथी. आवी वात छे. ल्यो, ९३ पूरी थई.

[प्रवचन नं. १प९, १६०, १६१ चालु * दिनांक १८-८-७६ थी २०-८-७६]