Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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४० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

समयसार गाथा ९४ः मथाळुं

हवे पूछे छे के अज्ञानथी कर्म कई रीते उत्पन्न थाय छे? तेनो उत्तर कहे छेः-

* गाथा ९४ः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘खरे खर आ सामान्यपणे अज्ञानरूप एवुं जे मिथ्यादर्शन-अज्ञान-अविरतिरूप त्रण प्रकारनुं सविकार चैतन्यपरिणाम ते, परना अने पोताना अविशेष दर्शनथी, अविशेष ज्ञानथी अने अविशेष रतिथी समस्त भेदने छुपावीने, भाव्यभावकभावने पामेलां एवां चेतन अने अचेतननुं सामान्य अधिकरणथी (जाणे के तेमनो एक आधार होय ए रीते) अनुभवन करवाथी, ‘‘हुं क्रोध छुं’’ एवो पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे.’

जुओ, मिथ्यादर्शन, अज्ञान अने अविरति-एम त्रण प्रकारनुं सामान्यपणे अज्ञानरूप एवुं सविकार चैतन्यपरिणाम छे. गाथा ९३मां रागादि भावने पुद्गलना परिणाम कह्या छे अने अहीं तेने ज सविकार चैतन्यपरिणाम कह्या छे.

परने पोताना मानवारूप, स्वरूपना अज्ञानरूप अने रागद्वेषनी प्रवृत्तिरूप एवा मिथ्यादर्शन-अज्ञान-अविरतिरूप त्रण प्रकारना सविकार चैतन्यपरिणाम छे. ए चैतन्य सविकार परिणाम परने अने पोताने अविशेष दर्शनथी एक माने छे. अज्ञानथी कर्म एटले विकारी परिणाम उत्पन्न थाय छे. ते परिणाम स्व अने परने अविशेष एटले सामान्य-एक माने छे. बे वच्चे विशेष मानतो नथी. विकारी परिणाम अने मारी चीज भिन्न छे एवुं अज्ञानी मानतो नथी. विकार परिणाम अने हुं-बे भिन्न छीए एम विशेष न मानतां बे एक छीए एवुं अविशेषपणे एटले सामान्य माने छे.

राग अने सुखदुःखनी कल्पना अने निज आत्मा-बन्ने एक छे एम सविकार चैतन्यपरिणाम माने छे बे वच्चे भेद-विशेष छे. एवुं अज्ञान वडे जीव मानतो नथी. वळी अविशेष ज्ञान एटले बन्नेनुं एकपणानुं ज्ञान करे छे राग अने हुं एक छीए एम बन्नेने एक जाणे छे. जीवना सविकार परिणाम आवुं बन्नेनुं एकपणुं माने छे, बन्नेनुं एकपणुं जाणे छे, बन्नेनुं एकपणुं आचरे छे. जडकर्मने कारणे आवुं बन्नेनुं एकपणुं जाणे छे, वा माने छे के आचरे छे एम नथी. स्व-परना अज्ञानने लीधे सविकार चैतन्यपरिणाम आवुं माने छे. आवी वात छे.

लोको भगवान समक्ष कहे छे ने के-हे भगवान! दया करो. अरे भाई! तुं पोते ज भगवान छो. माटे तारा उपर तुं दया कर. राग अने विकारने पोताना माने छे ए मान्यता छोडी प्रभु! तुं तारी दया कर. राग अने आत्मा बे एक छे ए मान्यता तारी हिंसा छे. माटे राग अने आत्मा एक छे ए मान्यता छोडी स्वभावमां लीन था. ते तारी स्वदया छे. भाई! तुं परनी हिंसा करी शकतो नथी अने परनी दया पाळी शकतो नथी. आवी ज वस्तुस्थिति छे.