प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
छ द्रव्य जे परद्रव्य छे तेनो विचार करतां जे विकल्प उत्पन्न थाय छे ते विकल्पनो जे कर्ता थाय छे ते ज्ञाताद्रष्टारूपे परिणमतो नथी; अने जे विकल्पनो जाणनार रहे छे ते विकल्पनो कर्ता थतो नथी. चिदानंद चैतन्यस्वरूप आनंदनो नाथ भगवान आत्मा छे. तेनुं अंतरमां लक्ष करी तेने जाणीने निर्विकल्प आनंद प्रगट न करे त्यां सुधी तेणे कांई जाण्युं नथी.
परद्रव्य मारुं छे एम मानतां जे विकल्प थाय ते विकल्प दुःख छे. विकल्पनो जे कर्ता थाय ते दुःखनो कर्ता थाय छे. भगवान आत्मा तो आनंदनो सागर छे. एनी द्रष्टि करतां अतीन्द्रिय आनंद प्रगट थाय तेवो छे. तेमां राग नथी अने ते रागनो कर्ता नथी. पण छ द्रव्य ते हुं छुं एवी भ्रान्तिने लीधे अज्ञानी सोपाधिक चैतन्यपरिणामरूपे परिणमे छे अने तेथी ते सोपाधिक चैतन्यपरिणामरूप पोताना भावनो कर्ता थाय छे. परद्रव्यने पोतानुं माने ते एवा विकल्पनो अज्ञानपणे कर्ता थाय छे अने ते चारगतिमां प्राप्त दुःखनुं कारण थाय छे.
‘धर्मादिना विकल्प वखते जे, पोते शुद्ध चैतन्यमात्र होवानुं भान नहि राखतां, धर्मादिना विकल्पमां एकाकार थई जाय छे ते पोताने धर्मादिद्रव्यरूप माने छे.’
छ द्रव्यना विचार वखते अज्ञानी ते विकल्पमां एकाकार थई जाय छे. ते धर्मास्तिकाय आदि छ द्रव्यरूप पोताने माने छे. हुं स्वभावे ज्ञाताद्रष्टा छुं एवी द्रष्टिथी भ्रष्ट थई मिथ्याद्रष्टि विकल्पनो कर्ता थाय छे.
‘आ प्रमाणे अज्ञानरूप चैतन्यपरिणाम पोताने धर्मादिद्रव्यरूप माने छे तेथी अज्ञानी जीव ते अज्ञानरूप सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे अने ते अज्ञानरूप भाव तेनुं कर्म थाय छे.’
छ द्रव्यना विचारना काळे जे राग छे ते अज्ञानरूप भाव छे. जे राग छे ते ज्ञाताना परिणाम नथी. भाई! जे एम माने के मारा देव-गुरु मने तारी देशे ते विकल्पनो कर्ता थईने मिथ्याद्रष्टि थाय छे. एकदम सार सार वात छे.
अज्ञानरूप चैतन्यपरिणाम पोताने छ द्रव्यरूप माने छे. माटे अज्ञानी जीव ते अज्ञानरूप सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे; अने ते अज्ञानरूप भाव तेनुं कर्म कहेतां कार्य थाय छे. राग ते अज्ञानीनुं कार्य छे. ल्यो, ९प पूरी थई.