समयसार गाथा-९प ] [ ४९ भगवान आत्मा निर्मळानंद प्रभु शुद्ध चैतन्यघनस्वरूप वस्तु छे. तेनो आश्रय लेवाथी अंतरंगमां जे निर्विकल्प द्रष्टि अने निर्विकल्प ज्ञान प्रगट थाय छे ते ज्ञानथी आत्मा जाणवामां आवे छे. परमात्मप्रकाशमां कह्युं छे के दिव्यध्वनिथी भगवान आत्मा जाणवामां आवतो नथी. गणधरादि महासंतोए रचेलां शास्त्रोथी आत्मा जाणवामां आवतो नथी. देव-गुरु-शास्त्रनी भक्तिनो भाव तो राग छे. तो रागथी शुं धर्म थाय? ना, बीलकुल नहि. धर्मनी पर्याय तो पोताना त्रिकाळी सच्चिदानंदस्वरूप अबद्धस्पृष्टस्वभावी भगवान आत्माना आश्रयथी प्रगट थाय छे. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे. अन्य जीव-स्त्री, पुत्रादिक हुं छुं एम माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. अरे भाई! स्त्रीनो आत्मा जुदो ने तारो आत्मा जुदो, स्त्रीनुं शरीर जुदुं अने तारुं शरीर जुदुं; बन्ने द्रव्यो साव जुदेजुदां छे. स्त्री कयांयथी आवी अने कयांय जशे, तुं कयांयथी आव्यो अने कयांय जईश; बन्नेनो कयांय मेळ नथी. हुं अने परनो आत्मा एक वाडना वेला छीए एवी तारी एकपणानी मान्यता तद्न अज्ञान छे. तुं भ्रान्तिवश एकपणुं मानी अज्ञानता सेवी रह्यो छे. अरे भाई! बधां द्रव्यो भिन्न भिन्न छे, अने त्रणकाळमां तेमनुं एकपणुं थवुं संभवित नथी. तने जे आ एकपणानी भ्रान्ति छे ते संसारमां रखडवानुं कारण छे. परवस्तु तो जाणवा योग्य ज्ञेय-परज्ञेय छे अने तुं भगवान ज्ञायक छे. भ्रमवश बन्नेनो आधार एक छे एम तें मान्युं छे. अन्य जीव-परद्रव्यनो विचार करतां जे विकल्प उठे छे ते विकल्पमां तन्मयपणे एकाकार थयेलो तुं अज्ञानपणे ते विकल्पनो कर्ता थाय छे अने ते मिथ्यादर्शन छे. हवे कहे छे-‘तेथी हुं धर्म छुं, हुं अधर्म छुं, हुं आकाश छुं, हुं काळ छुं, हुं पुद्गल छुं, हुं अन्य जीव छुं-एवी भ्रान्तिने लीधे जे सोपाधिक (उपाधि सहित) छे एवा चैतन्यपरिणामे परिणमतो थको आ आत्मा सोपाधिक चैतन्यपरिणामरूप पोताना भावनो कर्ता थाय छे.’ जुओ, विकल्पने-विकारने अहीं सोपाधिक-उपाधि सहित चैतन्यपरिणाम कह्या छे. बीजे तेने पुद्गलना परिणाम कह्या छे त्यां भेदज्ञान कराववानुं प्रयोजन छे. परंतु अहीं तो अज्ञानीनी वात चाले छे ने! जेने भेदज्ञान नथी एवो अज्ञानी जीव अज्ञानपणे विकल्पने- विकारने उत्पन्न करे छे तेथी तेने अहीं सोपाधिक चैतन्यपरिणाम कह्या छे. आत्मा ज्ञाताद्रष्टा सहजानंदस्वरूप ज्ञायक भगवान छे. तेने ज्ञानमां नहि जाणवाथी अज्ञानीने परद्रव्यसंबंधी जे विकल्प थाय छे ते विकल्पमां ते पर्यायबुद्धि वडे स्वार्पणता करी दे छे अने तेथी ते विकल्पनो कर्ता थाय छे. त्रिकाळी स्वरूपनी द्रष्टि विना अज्ञानी विकल्पनो कर्ता थाय छे, अने स्वरूपनी द्रष्टि थई छे तेवो ज्ञानी तेनो ज्ञाता रहे छे. आ कर्ताकर्मनुं स्वरूप बहु सूक्ष्म छे भाई! नाटक समयसारमां आवे छे ने के-