Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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४८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प एकाकार थई जाय छे. हुं आकाश छुं एवा विकल्प साथे एकाकार थईने ते आकाशने अने पोताने एक माने छे. आ प्रमाणे विकल्पनो कर्ता थाय छे ते मिथ्याद्रष्टि छे. लोकाकाशना एक एक प्रदेश उपर एक एक स्थित एम लोकप्रमाण असंख्यात काल द्रव्यो छे, ते जीवादि सर्व द्रव्योना प्रतिसमय थता परिणमनमां निमित्त छे. ते काळद्रव्यना विचारना काळे जे विकल्प थाय छे ते विकल्पमां अज्ञानी तल्लीन थई जाय छे. तेथी हुं काळ छुं एवा विकल्पमां लीन थयेलो ते काळ द्रव्यने अने पोताने एक माने छे अने ए विकल्पनो ते कर्ता थाय छे. ए ज प्रमाणे शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय, धनसंपत्ति इत्यादि पुद्गलो संबंधी विचारमां थता विकल्पो साथे एकाकार थईने आ पुद्गल हुं छुं एम अज्ञानपणे माने छे ते पण मिथ्याद्रष्टि छे. वळी अन्य जीव ते हुं छुं एम अज्ञानी माने छे. देव अने गुरु जे अन्य जीव छे ते देव-गुरुना विचारना काळमां जे विकल्प ऊठे छे ते विकल्पमां अज्ञानी तन्मयपणे लीन थई जाय छे. तेथी आ मारा देव छे, आ मारा गुरु छे अने ते मने धर्म करी देनारा छे इत्यादि अनेक विकल्पमां लीन थयेलो मिथ्याद्रष्टि जीव ते ते विकल्पनो कर्ता थाय छे. अरे! लोकोने जैनदर्शननी आवी सूक्ष्म वात कदी सांभळवा मळी नथी. पोतानी योग्यता नहि तेथी कोई संभळावनार मळ्‌या नहि. भगवान महाविदेहमां बिराजे छे त्यां जन्मे अने सांभळवानी योग्यता होय तो त्यां जाय. छतां भगवाननी वाणी सांभळे माटे पोतानुं कल्याण थई जाय एम वात नथी. भगवाननी वाणी सांभळवामां राग आवे छे. ते रागमां तन्मय-एकाकार थई जाय ते मिथ्याद्रष्टि छे. समोसरणमां जीव अनंतवार गयो छे पण तेथी शुं थयुं? मिथ्याद्रष्टि जैन साधु पण समोसरणमां होय छे, पण निमित्त शुं करे? अहाहा...! भगवान आत्मा चैतन्यस्वभावमय वस्तु त्रिकाळ अबद्धस्पृष्ट छे एम जे भगवाने कह्युं तेनो पोते अंतरमां द्रष्टि करी स्वीकार करे, देव-गुरुनुं लक्ष छोडी अंतर्मुख द्रष्टि करीने स्वरूपनुं लक्ष करे तो धर्म प्रगट थाय छे. देव-गुरुनी श्रद्धानो विकल्प पण छूटी जाय अने आत्मानो साक्षात् अनुभव थाय, स्वरूप-लीनता थाय एनुं नाम धर्म छे. गुरुनी भक्ति करो तो धर्म थई जशे एवी एकान्त मान्यता मिथ्यादर्शन छे. पोताना स्वरूपना लक्षे धर्म प्रगट थाय छे ते यथार्थ छे. मोक्षमार्ग प्रकाशकमां आवे छे के देव-गुरुनुं वास्तविक स्वरूप जाणे एने अवश्य सम्यग्दर्शन थाय छे. तथा शास्त्रमां कहेला अनेकान्त-स्वरूपने यथार्थ समजे तो धर्म प्रगट थाय छे. एनो अर्थ शुं? एनो अर्थ ए छे के देव-गुरु-शास्त्रने जाणी तेनुं लक्ष छोडी अंदर स्वरूपमां-शुद्ध चैतन्यमां एकाकार थाय तेने धर्म थाय छे. बाकी देव-गुरु-शास्त्र मने धर्म प्रगट करी देशे एम माने ए तो मिथ्यादर्शन छे. अहाहा...!