समयसार गाथा-९प ] [ ४७
हवे ए ज वातने विशेष कहे छेः-
‘खरेखर आ सामान्यपणे अज्ञानरूप एवुं जे मिथ्यादर्शन-अज्ञान-अविरतिरूप त्रण प्रकारनुं सविकार चैतन्यपरिणाम ते, परना अने पोताना अविशेष दर्शनथी, अविशेष ज्ञानथी अने अविशेष रतिथी (लीनताथी) समस्त भेदने छुपावीने ज्ञेयज्ञायकभावने पामेलां एवा स्व-परनुं सामान्य अधिकरणथी अनुभवन करवाथी, ‘‘हुं धर्म छुं, हुं अधर्म छुं, हुं आकाश छुं, हुं काळ छुं, हुं पुद्गल छुं, हुं अन्य जीव छुं’’ एवो पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे.’ ९४मी गाथामां भाव्यभावकभावने पामेलां स्वपरने अज्ञानी एकपणे अनुभवे छे एम लीधुं हतुं. अहीं आ गाथामां ज्ञेयज्ञायकभावने पामेलां स्वपरनुं एकपणे अनुभवन करवाथी ‘हुं धर्म छुं’ एवो पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे एम कह्युं छे. आत्मा ज्ञायक छे अने रागादि, धर्मादि छ द्रव्यो परज्ञेय छे. ते ज्ञेय अने ज्ञायक बन्नेनुं अधिकरण एक छे एम अज्ञानी अनुभवे छे. तेथी ते त्रण प्रकारना सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे. धर्मास्तिकायनो विकल्प आवे छे तो हुं धर्मास्तिकाय छुं एम अज्ञानी माने छे. पोताना शुद्ध चैतन्यमय ज्ञायकस्वरूपनुं ज्ञान छोडी धर्मास्तिकाय आदि छ प्रकारनां जे द्रव्यो छे तेनो विचार करतां ते संबंधीना विकल्पमां तल्लीन थई जाय छे. ते धर्मास्तिकाय आदिने पोतानां माने छे. धर्मास्तिकाय जीव-पुद्गलोने गतिमां निमित्त थाय एवो एक पदार्थ छे. तेनो विचार करतां जे विकल्प आव्यो तेमां अज्ञानी तन्मय थई जाय छे. पोताना ज्ञाताद्रष्टास्वभावनुं भान भूलीने धर्मास्तिकाय हुं छुं’ एम ते माने छे. तेवी रीते अधर्मास्तिकाय जीव-पुद्गलोने गतिपूर्वक स्थितिनुं निमित्त छे. अधर्मास्ति- कायनो विचार करतां तेनो जे विकल्प आवे छे तेमां अज्ञानी तद्रूप-एकाकार थई जाय छे. ते अधर्मास्तिकायने पोतानुं माने छे. पोते सदा ज्ञायकस्वभावी ज्ञाताद्रष्टास्वरूप चैतन्य-तत्त्व छे ए वातने भूलीने ‘हुं अधर्मास्तिकाय छुं’ एम विकल्पमां एकाकार थई अधर्मास्तिकायने अने पोताने एक माने छे. हुं शुद्ध चैतन्यकंद आनंदकंद प्रभु स्वरूपथी ज ज्ञाताद्रष्टा छुं एम जेने भान थयुं नथी एवो अज्ञानी जीव पर पदार्थनो विचार करतां ते काळे आ पर पदार्थ हुं छुं एवो विकल्प साथे तदाकार थईने ते पर पदार्थने पोतानो माने छे. आकाश नामनो एक पदार्थ सर्वत्र व्यापी भगवाने जोयो छे. ते सर्व द्रव्योने अवगाहनमां निमित्त छे. ते आकाशनो विचार करतां जे विकल्प थाय छे तेमां अज्ञानी