Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 95.

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गाथा–९प
तिविहो एसुवओगो अप्पवियप्पं करेदि धम्मादी।
कत्ता तस्सुवओगस्स होदि सो अत्तभावस्स।। ९५।।

त्रिविध एष उपयोग आत्मविकल्पं करोति धर्मादिकम्।
कर्ता तस्योपयोगस्य भवति स आत्मभावस्य।। ९५।।

हवे ए ज वातने विशेष कहे छेः-

‘हुं धर्म आदि’ विकल्प ए उपयोग त्रणविध आचरे,
त्यां जीव ए उपयोगरूप जीवभावनो कर्ता बने. ९प.

गाथार्थः– [त्रिविधः] त्रण प्रकारनो [एषः] [उपयोगः] उपयोग [धर्मादिकम्]

‘हुं धर्मास्तिकाय आदि छुं’ एवो [आत्मविकल्पं] पोतानो विकल्प [करोति] करे छे; तेथी [सः] आत्मा [तस्य उपयोगस्य] ते उपयोगरूप [आत्मभावस्य] पोताना भावनो [कर्ता] कर्ता [भवति] थाय छे. टीकाः– खरेखर आ सामान्यपणे अज्ञानरूप एवुं जे मिथ्यादर्शन-अज्ञान-अविरतिरूप त्रण प्रकारनुं सविकार चैतन्यपरिणाम ते, परना अने पोताना अविशेष दर्शनथी, अविशेष ज्ञानथी अने अविशेष रतिथी (लीनताथी) समस्त भेदने छुपावीने ज्ञेयज्ञायकभावने पामेलां एवा स्व-परनुं सामान्य अधिकरणथी अनुभवन करवाथी, ‘हुं धर्म छुं, हुं अधर्म छुं, हुं आकाश छुं, हुं काळ छुं, हुं पुद्गल छुं, हुं अन्य जीव छुं’ एवो पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे; तेथी, ‘हुं धर्म छुं, हुं अधर्म छुं, हुं आकाश छुं, हुं काळ छुं, हुं पुद्गल छुं, हुं अन्य जीव छुं’ एवी भ्रांतिने लीधे जे सोपाधिक (उपाधि सहित) छे एवा चैतन्यपरिणामे परिणमतो थको आत्मा ते सोपाधिक चैतन्यपरिणामरूप पोताना भावनो कर्ता थाय छे. भावार्थः– धर्मादिना विकल्प वखते जे, पोते शुद्ध चैतन्यमात्र होवानुं भान नहि राखतां, धर्मादिना विकल्पमां एकाकार थई जाय छे ते पोताने धर्मादिद्रव्यरूप माने छे. आ प्रमाणे, अज्ञानरूप चैतन्यपरिणाम पोताने धर्मादिद्रव्यरूप माने छे तेथी अज्ञानी जीव ते अज्ञानरूप सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे अने ते अज्ञानरूप भाव तेनुं कर्म थाय छे.