Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 1106 of 4199

 

समयसार गाथा-९४ ] [ ४प थाय, कर्म कांईक मार्ग आपे तो अमे धर्म करीए, गुण प्रगट करीए एम माने ते जडकर्मने अने आत्माने एक माने छे. कर्म ते ज हुं छुं अने कर्मथी मने लाभालाभ छे एम मानवुं, जाणवुं अने एमां लीनता करवी ते अज्ञान छे, अने ते अज्ञानभावनो अज्ञानी जीव कर्ता थाय छे.

* गाथा ९४ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

अज्ञानरूप एटले के मिथ्यादर्शन-अज्ञान-अविरतिरूप त्रण प्रकारनुं जे सविकार चैतन्यपरिणाम ते पोताने अने परनो भेद नहि जाणीने ‘‘हुं क्रोध छुं, हुं मान छुं’’ इत्यादि माने छे; तेथी अज्ञानी जीव ते अज्ञानरूप सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे अने ते अज्ञानरूप भाव तेनुं कर्म थाय छे.’ दया, दान अने पुण्यपापना भाव अने पोतानो भेद नहि जाणीने हुं क्रोध छुं, हुं राग छुं, हुं मान छुं, आ रागादि हुं करुं छुं, हुं दया पाळुं छुं-एवुं अज्ञानी माने छे. तेथी सविकार चैतन्यपरिणामरूपे परिणमतो ते पोताना सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे अने ते अज्ञानरूप भाव एनुं कर्म थाय छे. आ प्रमाणे भोक्तापणानी आ गाथामां पण कर्ताकर्मनुं कथन कर्युं. गाथा ९४ पूरी थई. आ वातने ९पमां वधु स्पष्ट करशे.

[प्रवचन नं. १६१ चालु * दिनांक २०-८-७६]