४४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
क्रोधनी माफक अज्ञानी हुं मान छुं, हुं माया छुं, हुं लोभ छुं इत्यादि भ्रांतिने लीधे पोताना सविकार परिणामनो कर्ता थाय छे. अहा! बे भिन्न वस्तुनी भिन्नता नहि जाणवाथी बेने एक मानी विकारी परिणाम अने शरीर, मन, वाणी, इन्द्रियो वगेरे हुं छुं एम मानी अज्ञानी जीव कर्ता थाय छे. भ्रान्तिने लईने अज्ञानी परने पोताना माने छे. शरीर, मन, वाणी, इन्द्रियो इत्यादि हुं छुं एम जाणवुं अने मानवुं ते अज्ञान छे. शरीर सारुं होय तो धर्म थाय, शरीरमां रोग थतां मने रोग थयो, शरीर पुष्ट रहेतां हुं पुष्ट छुं इत्यादि अनेक प्रकारे शरीर अने आत्माने एक जाणवा, मानवा अने एमां लीन थवुं ते संसारभाव छे. अज्ञानी अज्ञानपणे तेनो कर्ता थाय छे. मारो कंठ बहु मधुर छे अने हुं सरस बोली शकुं छुं, आ बोले छे ते हुं जीव छुं-एम वाणीने अने आत्माने एक मानी तेमां लीन थवुं ते संसार छे. मन अने स्पर्शादि इन्द्रियो ज्ञानमां निमित्त छे त्यां अज्ञानी माने छे के मन अने इन्द्रियो ते हुं छुं. ते वडे मने ज्ञान थाय छे, मन वडे हुं विचारुं छुं, स्पर्श वडे हुं शीत- उष्ण आदि स्पर्शने जाणुं छुं, जीभ वडे हुं मीठो, खाटो इत्यादि रसने जाणुं छुं, नाक वडे हुं सूंघु छुं, आंख वडे हुं वर्ण-रंगने जाणुं छुं अने कान वडे सांभळुं छुं. आ मन अने इन्द्रियो न होय तो हुं केम करीने जाणुं? आ प्रमाणे मन अने इन्द्रियोने अने आत्माने एक मानी तेमां लीनता करे ते संसार छे. अज्ञानी ते संसारभावनो कर्ता थाय छे. आ प्रमाणे जे चीज आत्माथी भिन्न छे तेने विचारी भेदज्ञान करवुं. राग अने विकल्प पण परवस्तु छे. परवस्तुथी स्ववस्तुने एटले आत्माने लाभ थाय एम बनी शके नहि. आत्मा पोताना जाणगस्वभावथी जाणवामां आवे छे-माटे ते प्रत्यक्ष ज्ञाता छे. प्रवचनसार गाथा १७२मां अलिंगग्रहणना वीस बोल छे. तेमां छठ्ठा बोलमां कह्युं छे के-‘‘लिंग द्वारा नहि पण स्वभाव वडे जेने ग्रहण थाय छे ते अलिंगग्रहण छे; आ रीते आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञाता छे एवा अर्थनी प्राप्ति थाय छे.’ आत्मा इन्द्रिय प्रत्यक्ष नथी. इन्द्रियो वडे जणाय एवी चीज आत्मा नथी. अने इन्द्रियो वडे आत्मा जाणे छे एम पण नथी. आ बहारनां धन, संपत्ति, स्त्री, पुत्र, परिवार, दास, दासी इत्यादि जे नोकर्म ते मारां छे एम एकत्वबुद्धिए जाणवां-मानवां अने तेमां एकत्वबुद्धिए लीन थवुं ए बधुं अज्ञान छे. स्त्री अर्धांगना छे अने पुत्र छे ते हुं छुं एम माने पण ए तो धूळेय तारुं नथी. मात्र अज्ञानभाव-संसारभाव छे अने अज्ञानी ते संसारभावनोसविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे.