समयसार गाथा-९४ ] [ ४३ एम अविशेष दर्शनथी बन्नेने एक माने छे. ९२मी गाथामां अज्ञानीनी वात करी हती. त्यां कर्ताकर्मनी वात हती. अहीं आ गाथामां भाव्यभावकभाव कहीने भोक्तापणानी वात करी छे. अज्ञानी राग अने आत्माने एकपणे अनुभवे छे. रागनो विकल्प अने आत्मा बेनो एक आधार मानी बेनो एकपणे अज्ञानी अनुभव करे छे. एटले के विकारी परिणामनुं अज्ञानी वेदन करे छे. अज्ञानी विकारी परिणामनो भोक्ता थाय छे. भगवान आत्मा जे ज्ञाताद्रष्टा छे तेनो अज्ञानी भोक्ता थतो नथी. ज्यारे ज्ञानी पोताना ज्ञाननो भोक्ता थाय छे. भाई! पोतानो आग्रह छोडी खूब शान्ति अने धीरजथी भगवाने जेम कह्युं छे तेम समजवुं जोईए. अज्ञानी हुं ज्ञाताद्रष्टा छुं एम अनुभववाने बदले राग अने आत्मानो एक आधार मानी हुं राग छुं, हुं क्रोध छुं इत्यादिरूप पोताने अनुभवे छे. चैतन्यस्वभावथी विरुद्ध भावना अनुभवने क्रोध कहेवामां आवे छे. अज्ञानी ‘हुं क्रोध छुं एम पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे. ‘तेथी हुं क्रोध छुं एवी भ्रान्तिने लीधे जे सविकार (विकार सहित) छे एवा चैतन्यपरिणामे परिणमतो थको आ आत्मा ते सविकार चैतन्यपरिणामरूप पोताना भावनो कर्ता थाय छे.’ जुओ, हुं क्रोध छुं एम माने ते भ्रान्ति छे. व्यवहारना रागनो पोताने कर्ता अने भोक्ता माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. पोताना आनंदनुं वेदन जेने नथी ते एकलुं रागनुं वेदन करे छे. तेने आत्मा प्रति क्रोध छे. भाई! जिनेश्वर परमात्मानो मार्ग समजवा माटे घणी तत्परता जोईए. कहे छे-‘हुं क्रोध छुं’ एवी भ्रान्तिने लीधे सविकार चैतन्यपरिणामे अज्ञानी परिणमे छे. अने ते आत्मा सविकार चैतन्यपरिणामरूप पोताना भावनो कर्ता थाय छे. जड कर्मनी साथे कांई संबंध नथी. अज्ञानपणे पोताना सविकारी परिणामनो अज्ञानी पोताथी कर्ता थाय छे. जे विकारी भाव थाय ते मारा छे, मारुं कर्तव्य छे एम अज्ञानी माने छे तेथी तेनो ते कर्ता थाय छे. शरीर तो कयांय बहार रही गयुं. ए तो रजकण धूळ छे. एनुं अस्तित्व मारामां नथी. जडकर्म पण मारी चीज नथी. अहीं तो कहे छे के व्यवहाररत्नत्रयनो जे विकल्प आवे तेनुं अस्तित्व पण मारी त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यमय वस्तुमां नथी. आवुं भेदज्ञान जेने नथी एवो अज्ञानी जीव सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे. विकारना परिणाम ते चैतन्यना परिणाम छे. भेदज्ञान करवाना प्रयोजनथी तेने पुद्गलना कह्या छे. परंतु अज्ञानपणे ते भाव पोतानी पर्यायमां थाय छे. रागद्वेषना भाव कांई जडमां थता नथी; प्रयोजनवश तेने जडना कहेला छे.
हवे कहे छे-‘एवी ज रीते ‘क्रोध’ पद पलटावीने मान, माया, लोभ, मोह, राग, द्वेष, कर्म, नोकर्म, मन, वचन, काय, श्रोत्र, चक्षु, घ्राण, रसना अने स्पर्शननां सोळ सूत्रो व्याख्यानरूप करवां; अने आ उपदेशथी बीजां पण विचारवां.