Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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४२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प हुं भोगवनार भावक अने भोगववा योग्य विकार ते मारुं भाव्य अथवा विकारी भाव भावक अने हुं भोगववा योग्य भाव्य एम भाव्यभावकपणाने पामेलां एवां चेतन अने अचेतननुं- बेनुं जाणे सामान्य अधिकरण-आधार होय तेम अज्ञानथी माने छे. भगवान आत्मा ज्ञायक प्रभु शुद्ध चैतन्यमय छे अने रागमां चैतन्यनो अभाव होवाथी ते अचेतन छे. आ चेतन अचेतन बन्नेनो अज्ञानी एक आधार माने छे. विकारनो उत्पन्न करनार पण हुं अने ज्ञानमां जाणवुं थाय तेनो उत्पन्न करनार पण हुं-एम अज्ञानी बन्नेनुं सामान्य अधिकरण माने छे. बहु सूक्ष्म वात भाई! जैनदर्शन खूब झीणुं छे. भाई! सम्यग्दर्शन कोई अलौकिक वस्तु छे! लोकोए जेवुं कल्प्युं छे एवुं साधारण एनुं स्वरूप नथी. देव-गुरु-शास्त्रनी भेदरूप श्रद्धा करो तो समकित थई गयुं एम माने ते अज्ञानी छे. एवी श्रद्धा तो प्रभु! अनंतवार करी छे. अहीं कहे छे एवा रागना-विकारना परिणाम अने आत्माना ज्ञाननो आधार सामान्य-एक छे एम अज्ञानी माने छे. ज्ञाताद्रष्टानो चैतन्यभाव अने रागना परिणाम बेनुं एक अधिकरण छे एम अनुभवन करवाथी ‘हुं क्रोध छुं’ एम पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे. पोताना ज्ञाताद्रष्टा स्वभावनो अनादर करी राग मारी चीज छे, पुण्य-पापना भाव मारी चीज छे एवुं माने तेने पोताना स्वभाव प्रत्ये अणगमो छे, द्वेष छे, क्रोध छे. हुं रागथी भिन्न ज्ञातास्वरूपे छुं एवुं ज्ञान न करतां अज्ञानथी जे रागादि उत्पन्न थयां ते रागादि अने आत्मा बेनो एक आधार छे एम मानी हुं राग छुं, हुं द्वेष छुं, हुं पुण्य छुं, हुं पाप छुं एवो पोतानो विकल्प उत्पन्न करे छे. आ दया, दान, व्रतादिना विकल्पनो हुं कर्ता छुं एम मानी अज्ञानी पोतानो विकल्प नाम वृत्ति उत्पन्न करे छे. केटली वात करी, देखो! मिथ्यादर्शनादि सविकार चैतन्यपरिणाम छे एक वात. अने ते सविकार चैतन्यपरिणाम एम माने छे के राग अने आत्मा-हुं एक छीए ते दर्शन (अविशेष), राग अने आत्मा-हुं एक छीए एम जाणपणुं ते ज्ञान (अविशेष) अने रागमां तन्मयपणे लीनता करे ते वृत्ति (अविशेष). आ प्रमाणे राग अने आत्माने एक माने छे, एक जाणे छे अने एक अनुभवे छे. अहो! श्री अमृतचंद्रस्वामीए रचेली आ टीका खूब गंभीर छे. घणा गंभीर न्यायो प्रकाश्या छे. टूंका शब्दोमां केटलुं भरी दीधुं छे! जाणे गागरमां सागर! कहे छे-प्रभु! तुं ज्ञायकस्वरूप चैतन्यमात्र वस्तु छो. अने पुण्यपाप, दया, दान अने व्यवहाररत्नत्रयना जे विकल्प ऊठे ते पुद्गलनी अवस्था छे, केमके ते अचेतन छे. अज्ञानपणे जीव तेने करे छे माटे तेने अहीं सविकार चैतन्यपरिणाम कह्या छे. ते सविकार चैतन्यपरिणाम अज्ञानपणे राग अने आत्माने एकपणे माने छे. बे वच्चे भेद नथी