प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प छे. वळी जेम अपरीक्षक आचार्यना उपदेशथी महिषनुं (पाडानुं) ध्यान करतो कोई भोळो पुरुष अज्ञानने लीधे महिषने अने पोताने एक करतो थको, ‘हुं गगन साथे घसातां शिंगडांवाळो मोटो महिष छुं’ एवा अध्यासने लीधे मनुष्यने योग्य एवुं जे ओरडाना बारणामांथी बहार नीकळवुं तेनाथी च्युत थयो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे; तेवी रीते आ आत्मा पण अज्ञानने लीधे ज्ञेयज्ञायकरूप परने अने पोताने एक करतो थको, ‘हुं परद्रव्य छुं’ एवा अध्यासने लीधे मनना विषयरूप करवामां आवेलां धर्म, अधर्म, आकाश, काळ, पुद्गल अने अन्य जीव वडे (पोतानी) शुद्ध चैतन्यधातु रोकायेली होवाथी तथा इंद्रियोना विषयरूप करवामां आवेला रूपी पदार्थो वडे (पोतानो) केवळ बोध (-ज्ञान) ढंकायेल होवाथी अने मृत कलेवर (-शरीर) वडे परम अमृतरूप विज्ञानघन (पोते) मूर्छित थयो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे.
तेने चेतन भावक साथे एकरूप माने छे; वळी ते, पर ज्ञेयरूप धर्मादिद्रव्योने पण ज्ञायक साथे एकरूप माने छे. तेथी ते सविकार अने सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे.
अहीं, क्रोधादिक साथे एकपणानी मान्यताथी उत्पन्न थतुं कर्तृत्व समजाववा भूताविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत कह्युं अने धर्मादिक अन्यद्रव्यो साथे एकपणानी मान्यताथी उत्पन्न थतुं कर्तृत्व समजाववा ध्यानाविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत कह्युं.
कर्तापणानुं मूळ अज्ञान ठर्युं एम हवे कहे छेः-
‘खरेखर ए रीते, ‘‘हुं क्रोध छुं’’ इत्यादिनी जेम अने ‘‘हुं धर्मद्रव्य छुं’’ इत्यादिनी जेम आत्मा परद्रव्योने पोतारूप करे छे अने पोताने पण परद्रव्यरूप करे छे.’
जुओ, आ अज्ञानीनी वात चाले छे. ‘हुं क्रोध छुं’ एम मानतो थको पोताना सविकार चैतन्यपरिणामनो आत्मा कर्ता थाय छे ए वात गाथा ९४मां लीधी. अने हुं धर्मादि छ द्रव्य छुं एम मानतो थको पोताना सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो आत्मा कर्ता थाय छे-एम गाथा ९पमां लीधुं छे. एकमां सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता अने बीजामां सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता-एम बेमां फरक पाडयो छे. हुं क्रोध छुं, मान छुं, माया छुं, लोभ छुं, राग छुं, द्वेष छुं इत्यादि गाथा ९४मां सोळ बोल लीधा छे.