Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९६ ] [ प३ अने हुं अन्य जीव छुं, पुद्गल छुं, इत्यादि छ द्रव्य छुं एम गाथा ९पमां लीधुं छे. आ दीकरो मारो छे, पत्नी मारी छे, कन्या मारी छे, मकान मारुं छे, धन-संपत्ति मारां छे एम अज्ञानी माने छे अने ए प्रमाणे ते परद्रव्योने पोतारूप करे छे अने पोताने पण परद्रव्यरूप करे छे.

भाई! आ वीतरागमार्गनी वात खूब धीरज अने शांतिथी सांभळवी जोईए. एटलुं ज नहि तेनो घरे स्वाध्याय अने मनन करवां जोईए. घरे चोपडा (नामाना) फेरवे पण ए तो एकलो पापनो वेपार छे. आ बैरां छोकरां सारु रळीए अने कमाईए अने एमनुं पालनपोषण करीए एम जे माने छे ते मिथ्याद्रष्टि छे. अरे भाई! कुटुंब सारु पैसा कमाईए एम तुं समजे छे पण कोनुं कुटुंब? कोण कमाय? अने कोना पैसा? कुटुंब तो बधा अन्य जीव छे अने पैसा तो जडना छे. बधुं भिन्न भिन्न छे. अहा! स्वद्रव्य अने परद्रव्यनी भिन्नता जाणवी ए अलौकिक चीज छे अने जेने भेदज्ञान थई जाय तेने तो मानो मुक्ति हाथ आवी गई. परंतु अज्ञानी परद्रव्योने पोतारूप अने पोताने पण परद्रव्यरूप करे छे!

अज्ञानी जीव स्वद्रव्य-परद्रव्यने एक माने छे. ‘तेथी आ आत्मा, जोके ते समस्त वस्तुओना संबंधथी रहित बेहद शुद्ध चैतन्यधातुमय छे तोपण, अज्ञानने लीधे ज सविकार अने सोपाधिक करायेला चैतन्यपरिणामवाळो होवाथी ते प्रकारना पोताना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे.’

अहाहा...! भगवान आत्मा समस्त वस्तुना संबंधथी रहित बेहद शुद्ध चैतन्य-धातुमय छे. आत्मा राग, पुण्य, पाप, शरीर, मन, वाणी, देव, गुरु, शास्त्र इत्यादि सर्व वस्तुओना संबंधथी रहित शुद्ध चैतन्यमय प्रभु छे. अहाहा...! जेणे शुद्ध चैतन्यने धारी राख्युं छे एवो पोते चैतन्यधातुमय छे. आत्मा आवो होवा छतां अज्ञानना कारणे हुं क्रोध, मान, माया, लोभ छुं अने हुं धर्मास्तिकाय आदि छ द्रव्यस्वरूप छुं एम माने छे. ते जीव सविकार अने सोपाधिक चैतन्यपरिणामवाळो होवाथी ते प्रकारना पोताना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे. आ अज्ञानीनी वात छे एटले सविकार अने सोपाधिक चैतन्यपरिणामने पोताना भाव कह्या छे अने ते प्रकारना पोताना भावनो ते कर्ता प्रतिभासे छे एम कह्युं छे. ज्ञायक तो ज्ञायक छे पण अज्ञानमां आवो प्रतिभास थाय छे के विकारी भावनो हुं कर्ता छुं अने ते भाव मारुं कर्तव्य छे. (शुद्ध निश्चयथी विकारी परिणाम आत्माना नथी).

‘आ रीते, भूताविष्ट (जेना शरीरमां भूत प्रवेश्युं होय एवा) पुरुषनी जेम अने ध्यानाविष्ट (ध्यान करता) पुरुषनी जेम आत्माने कर्तापणानुं मूळ अज्ञान ठर्युं’ अहीं सविकार चैतन्यपरिणामने समजाववा भूताविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत आप्युं छे अने