प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प सोपाधिक चैतन्यपरिणामनुं स्वरूप समजाववा ध्यानाविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत आप्युं छे. रागादि परिणाम मारां छे अने छ द्रव्य मारां छे एवुं जे अज्ञान ते रागना कर्तापणानुं मूळ छे एम सिद्ध थयुं. आत्मा शुद्ध चैतन्यस्वभावमय ज्ञाताद्रष्टास्वरूप छे. तेनुं भान नहि होवाथी हुं राग छुं, हुं परद्रव्यस्वरूप छुं एवी मान्यता वडे उत्पन्न थयेलुं अज्ञान ते रागना कर्तापणानुं मूळ छे, परद्रव्य नहि-ए वात द्रष्टांतथी समजाववामां आवे छे.
‘जेम भूताविष्ट पुरुष अज्ञानने लीधे भूतने अने पोताने एक करतो थको, मनुष्यने अनुचित एवी विशिष्ट चेष्टाना अवलंबन सहित भयंकर आरंभथी भरेला अमानुष व्यवहारवाळो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे...’
भूताविष्ट पुरुष अज्ञानना कारणे भूतने अने पोताने एक माने छे. भूत शरीरमां प्रवेश करीने जे अनेक प्रकारे चेष्टा करे ते हुं छुं एम ते माने छे. तेम पर्यायमां जे पुण्य- पापना भाव थाय ते हुं छुं एम अज्ञानी माने छे. वास्तवमां भूतनी जेम ते पुण्य-पापना भाव आत्मा नथी. पुण्य-पापना भाव हुं छुं एम मानवावाळो अज्ञानी जीव भूताविष्ट पुरुष समान छे.
जुओ, रामचंद्रजी क्षायिक समकिती हता. बार बार वर्षथी जंगलमां सीताजी अने लक्ष्मणनी साथे रहेता हता. लक्ष्मण मोटाभाई रामनी अने सीताजीनी अनेक प्रकारे सेवा करता. एकवार ज्यारे सीताजीने रावण अपहरण करीने लई गयो त्यारे खूब व्यग्र थयेला रामचंद्रजी जंगलना वृक्ष अने वेलने, पहाड अने पत्थरने पण पूछवा लाग्या के-सीताने कयांय जोई? जुओ, आ चारित्रमोहना रागनी विचित्र चेष्टा! हाथमां नूपुर बतावीने लक्ष्मणने पूछवा लाग्या-आ नूपुर कोनुं छे? शुं आ नूपुर सीताजीनुं छे? त्यारे लक्ष्मणे कह्युं-बंधुवर! सीताजीनां दर्शन करवा एकवार हुं गयेल तो पग उपर मारी नजर गयेली त्यारे सीताजीना पगे पहेरेलुं नूपुर में जोयेलुं. माटे आ नूपुर सीताजीनुं लागे छे. अहाहा...! केवुं नैतिक पवित्र जीवन!
युद्धमां रावणे विद्यामय बाण मार्युं तो लक्ष्मण मूर्छित थई पडी गया. खबर हती के लक्ष्मण वासुदेव छे तोपण राम खेद करवा लाग्या-हे भाई! हे लक्ष्मण! एकवार तो बोल. मने एकलाने जोई माता कौशल्या पूछशे के सीता अने लक्ष्मण कयां छे? तो हुं माताने शुं जवाब दईश? बंधु मारा-भाई लक्ष्मण! एकवार तुं बोल. त्यारपछी जे ब्रह्मचारिणी हती अने जेने लब्धि प्रगट थई हती एवी त्रिशल्याना स्नाननुं जळ छांटवाथी लक्ष्मणनी मूर्छा उतरी गई अने लक्ष्मण जागृत थया त्यारे राम आनंदित थया. जुओ! चारित्रमोहना रागनी आ केवी विचित्र लीला छे! चारित्रनी कमजोरीना कारणे आवा अनेक प्रकारे समकितीने राग आवे छे पण कोई पण रागने धर्मी पोताना मानता नथी. राम तो पुरुषोत्तम हता, तद्भवमोक्षगामी हता. आवा