Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९६ ] [ पप विचित्र रागने प्राप्त थया तेम छतां ते रागने अने परद्रव्यने पोताना समजता न हता. भेदज्ञाननो कोई एवो अचिंत्य महिमा छे. अहो भेदज्ञान!

अहीं कहे छे-भाई! तारी त्रिकाळी चैतन्यमय चीजने भूलीने तुं राग अने परद्रव्यमां एकाकार थयो छे अने पुण्यपापना भावोने पोतानां माने छे ते तारी चेष्टा भूताविष्ट पुरुषना जेवी छे. पुण्यपापना भाव अने परद्रव्य मारां छे एम तुं माने ते भूताविष्ट पुरुषनी जेम तारुं पागलपणुं, गांडपण अने बेभानपणुं छे.

भूताविष्ट पुरुष अज्ञानना कारणे अमानुष अनुचित चेष्टा करे छे. जेने भूतनो प्रवेश थयो होय तेने हुं मनुष्य छुं अने आ भूत छे एवुं (विवेकयुक्त) भान रहेतुं नथी. मनुष्यने न शोभे एवी ते चेष्टाओ करे छे अने ते बधी पोतानी माने छे. घडीकमां दांत काढे, घडीकमां हाथ पग पछाडे, वळी धूणवा लागी जाय, दोडे, भागे, बूम बराडा पाडे एम अनेक प्रकारे धमाचकडी करी मूके छे. आ प्रमाणे भूताविष्ट पुरुष मनुष्यने न शोभे तेवी विशिष्ट चेष्टाना अवलंबन सहित भयंकर आरंभथी भरेला अमानुष व्यवहारवाळो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे. आ द्रष्टांत कह्युं. हवे सिद्धांत कहे छेः-

‘तेवी रीते आ आत्मा पण अज्ञानने लीधे ज भाव्य-भावकरूप परने अने पोताने एक करतो थको, अविकार अनुभूतिमात्र जे भावक तेने अनुचित एवा विचित्र भाव्यरूप क्रोधादि विकारोथी मिश्रित चैतन्यपरिणामविकारवाळो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे.’

आ आत्मा अज्ञानना कारणे भाव्य-भावकरूप परने अने पोताने एक करे छे. मोहकर्म ते भावक अने पुण्यपापना विकारी भाव ते एनुं भाव्य-ए बेने अज्ञानी पोतानाथी एकरूप माने छे. निश्चयथी कर्म भावक अने शुभाशुभ राग तेनुं भाव्य छे. परंतु हुं भावक अने शुभाशुभ राग मारुं भाव्य छे एम अज्ञानी माने छे. रागथी भिन्न शुद्ध चैतन्यमय ज्ञायकमात्र हुं छुं एवी जेने द्रष्टि थई नथी ते अज्ञानी दया, दान, व्रतादिना अने हिंसादिना जे अनेक विकल्पो थाय ते विकल्परूप चेष्टा मारी छे एम माने छे.

पुण्यपापना भाव ते मोहकर्मनुं भाव्य छे. छतां आ विकारी भाव पोतानुं (आत्मानुं) भाव्य छे एवी मान्यताना वळगाडथी भूताविष्ट पुरुषनी जेम अज्ञानी जीव पागल-गांडो थई गयो छे. जेने भूत वळग्युं होय तेने तो मर्यादित काळनुं अने वधारेमां वधारे एक भवनुं गांडपण रहे छे. पण आ शरीरादि मारां अने पुण्यपापना भाव मारा एम जेणे मान्युं छे एनुं गांडपण तो अनादिनुं छे, अनंतकाळथी छे. हे भाई! आ मनुष्यभवमां जो आ गांडपण न गयुं तो भुंडा हाल थशे. आ गांडपणनुं