Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प फळ तो चार गतिनी रखडपट्टी छे. आवुं गांडपण भेदज्ञान वडे ज दूर थाय छे. परमां सुखबुद्धि छे तेथी परने पोतानुं मानवारूप भाव छे. परंतु शुद्ध चैतन्यमय सुखधाम एवा स्वरूपमां सुखबुद्धि थतां परने पोतानुं मानवारूप गांडपण दूर थई जाय छे. मनुष्यभवनी सार्थकता विचारी हे भाई! भेदज्ञान प्रगट कर.

अज्ञानी रागने अने पोताने एक करतो थको अनुभूतिमात्र जे भावक तेने अनुचित एवा विचित्र भाव्यरूप क्रोधादि विकारोथी मिश्रित चैतन्यपरिणामविकारवाळो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे. जुओ, पुण्य अने पापना भाव पोताना अविकार अनुभूतिमात्र भावकने अनुचित भाव्य छे. भगवान आत्मा निर्मळ ज्ञान अने आनंदनी मूर्ति छे. तेने तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान अने अतीन्द्रिय आनंदनी निर्मळ अवस्थारूपे थवुं शोभे. निर्मळ वीतरागी शान्तिनुं वेदन करवुं ए ज तेनुं उचित भाव्य छे. जेम भूतनी चेष्टा ते मनुष्यने योग्य चेष्टा नथी तेम पुण्य-पापना भावनी जे चेष्टा थाय ते भगवान आत्माने योग्य चेष्टा नथी. ते अनुभूतिस्वरूप भावकनुं अनुचित भाव्य छे. पुण्यपापना भावनी चेष्टा प्रगट थतां जेवुं निर्विकार चैतन्यस्वरूप छे तेवी निर्विकारी अवस्था न रहेतां चैतन्यनी पर्यायमां विकारनुं मिश्रितपणुं थई जाय छे.

अज्ञानीने क्रोधादि भावो, पुण्यपापना भावो पोताना भासे छे, पण ते भावोथी भिन्न हुं चैतन्यमूर्ति भगवान ज्ञायक छुं एम तेने भासतुं नथी. हुं तो मारा निर्मळ ज्ञान-सुखादि स्वरूपनो अनुभव करनार छुं एम अज्ञानीने पोतानुं स्वरूप भासतुं नथी. तेथी ते पोताथी एकरूप कहेला पुण्य-पाप आदि विकारी भावोनो, सविकार चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे. आवो मार्ग लोकोने सांभळवो पण कठण पडे तो ते पोतामां प्रगट केम करीने करे? अहो! जेना जन्म-मरणनो अंत नजीक आवी गयो छे तेने ज आ वात बेसे एम छे.

आ प्रमाणे ९४मी गाथामां सोळ बोल द्वारा जे कह्या ते सघळा सविकार चैतन्यपरिणामनो अज्ञानी कर्ता प्रतिभासे छे, केमके तेने शुद्ध चैतन्यस्वरूप भासतुं नथी. तेना कर्तापणानुं मूळ अज्ञान छे एम अहीं सिद्ध कर्युं.

हवे छ द्रव्यने मारां माने छे ए सोपाधिक चैतन्यपरिणामनुं स्वरूप समजवा ध्यानाविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत कहे छे-

‘वळी जेम अपरीक्षक आचार्यना उपदेशथी महिषनुं (पाडानुं) ध्यान करतो कोई भोळो पुरुष अज्ञानने लीधे महिषने अने पोताने एक करतो थको ‘‘हुं गगन साथे घसातां शिंगडांवाळो मोटो महिष छुं’’ एवा अध्यासने लीधे मनुष्यने योग्य एवुं जे ओरडाना बारणामांथी बहार नीकळवुं तेनाथी च्युत थयो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे....’