समयसार गाथा-९६ ] [ प७
जुओ, कोई अपरीक्षक एटले अणघड गुरुए कोई भोळा पुरुषने पोताने इष्ट होय तेनुं ध्यान करवा कह्युं. त्यां ते भोळो पुरुष पोताने इष्ट एवा पाडानुं ध्यान करवा लाग्यो. पाडो आवो पुष्ट शरीरवाळो, भारे माथावाळो अने खूब मोटां शिंगडांवाळो छे एम ध्यान करतां करतां अज्ञानने लीधे ते पाडाने अने पोताने एक मानवा लाग्यो. पाडो आवो, पाडो तेवो एम विचार करतां करतां हुं ज आवो गगनचुंबी शिंगडांवाळो मोटो महिष छुं एम एने थई गयुं. अरे! आ बारणुं नानुं अने शिंगडां मोटां छे. हवे हुं बारणामांथी बहार केम करीने नीकळुं? पोते मनुष्य छे अने मनुष्यने योग्य बहार नीकळी शकाय एवुं बारणुं छे ए भूली गयो. पोते बारणामां थई ओरडामां पेठो ते मनुष्य ज हतो, पण हुं मोटा शिंगडांवाळो पाडो ज छुं एम अध्यास थई जवाथी मनुष्यने योग्य एवुं जे ओरडाना बारणामांथी बहार नीकळवुं तेनाथी ते च्युत थई गयो होवाथी हुं पाडो छुं ते प्रकारना भावनो ते कर्ता प्रतिभासे छे.
एम अज्ञानीने परद्रव्य मारां छे एवी चिरकाळनी मान्यताना कारणे परद्रव्यमांथी नीकळवुं मुश्केल थई पडयुं छे. आ स्त्री, पुत्र, परिवार, मकान, धनसंपत्ति, देव, गुरु इत्यादि बधां परद्रव्य मारां छे एवुं एणे ध्यान कर्युं छे अने जाणे के पोते ते-रूप थई छे गयो एम मानवा लाग्यो छे. एटले हवे एमांथी छूटवुं एने भारे मुश्केल थई गयुं छे. परद्रव्यना विचारमां ते एवो तो एकाकार थई गयो छे के हुं शुद्ध चैतन्यमय आत्मा छुं ए भूली गयो छे अने हुं परद्रव्यस्वरूप छुं एम मानवा लाग्यो छे. पोताने भूलीने परद्रव्यना ध्यानमां मश्गुल थयेला तेने हवे परद्रव्यथी खसवुं अत्यंत मुश्केल थई पडयुं छे. अहो! आचार्यदेवे अपार करुणा करीने आवी वात करी छे. कहे छे-परद्रव्यने पोताना माने तेने तेमांथी बहार नीकळवुं भारे कठण पडे छे. देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो विकल्प ते राग छे. अने ते राग भलो छे एम माने तेने एनाथी भिन्न थवुं मुश्केल छे.
हवे कहे छे-ध्यानाविष्ट पुरुष जेम ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे ‘तेवी रीते आ आत्मा पण अज्ञानने लीधे ज्ञेयज्ञायकरूप परने अने पोताने एक करतो थको ‘‘हुं परद्रव्य छुं’’ एवा अध्यासने लीधे मनना विषयरूप करवामां आवेलां धर्म, अधर्म, आकाश, काळ, पुद्गल अने अन्य जीव वडे (पोतानी) शुद्ध चैतन्यधातु रोकायेली होवाथी तथा इंद्रियोना विषयरूप करवामां आवेला रूपी पदार्थो वडे (पोतानो) केवळ बोध (-ज्ञान) ढंकायेल होवाथी अने मृतक कलेवर (शरीर) वडे परम अमृतरूप विज्ञान-घन (पोते) मूर्छित थयो होवाथी ते प्रकारना भावनो कर्ता प्रतिभासे छे.’
धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश, काळ, पुद्गल अने अन्य जीव देव-गुरु इत्यादि खरेखर ज्ञानना ज्ञेय छे. ते परद्रव्यो आत्मामां नथी. पोते ज्ञायक छे अने ते