प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प बधां परज्ञेय छे. अज्ञानी ज्ञायक अने ज्ञेयने एक करे छे. देव, गुरु, शास्त्र इत्यादि ज्ञेयनो विचार-ध्यान करतां हुं ज्ञेयरूप छुं एम तेने भ्रम ऊपजे छे. ज्ञानमां देव-गुरु-शास्त्र आदि परद्रव्य जणायां त्यां ते परद्रव्योथी मारुं ज्ञान छे, ते परद्रव्य विना मारुं ज्ञान उघडे नहि एम ते परज्ञेयने अने पोताने एक करे छे. स्त्री, कुटुंब, मित्र, देव-गुरु-शास्त्र इत्यादि हुं छुं अने ए मारां छे एवी मान्यता मिथ्यादर्शन छे अने एवी मान्यता वडे मिथ्याद्रष्टि जीव पोताना अज्ञानभावनो कर्ता थाय छे.
मनना विषयरूप छ द्रव्यो छे. धर्मास्तिकाय आदि छ द्रव्यो मनना विषय छे. स्त्री, पुत्र, परिवार, देव-गुरु-शास्त्र, भगवान तीर्थंकरदेव सुद्धां सघळा परपदार्थ मनना विषय छे. सहज चैतन्यस्वभाव, ज्ञायकस्वभाव अतीन्द्रियज्ञाननो विषय छे. आत्माना निर्मळ स्वसंवेदनना पुरुषार्थना समये मन उपस्थित छे पण ते मुख्य नथी; आत्मा ज मुख्य छे. आत्मानुं भान आत्मा वडे ज थाय छे. त्यां मन तो उपस्थितिमात्र छे. खरेखर तो मननो विषय परवस्तु छे. छ द्रव्यरूप परनो विचार करतां मनना निमित्ते शुभाशुभ विकल्प उत्पन्न थाय छे अने ए विकल्पमां पोतानी शुद्ध चैतन्यधातु रोकाई जाय छे. ज्ञायकभावस्वरूप भगवान आत्माने छोडी परद्रव्यना विकल्पमां रोकाय छे तेने पर वडे शुद्ध चैतन्यधातु रोकायेली छे एम कहेवामां आवे छे. परद्रव्यना विचारमां रोकायेलो अज्ञानी जाणे हुं पररूप थई गयो एम भ्रमथी माने छे.
पोताना ज्ञायकस्वभावने ज्ञानवडे धारी राखवो जोईए तेने बदले अज्ञानीने मनना विषयमां शुद्ध चैतन्यधातु रोकाई जाय छे. सिद्ध भगवान, अरहंत भगवान, आचार्य भगवान आदि पंचपरमेष्ठी अरूपी छे. तथा धर्म, अधर्म, आकाश अने काळ पण अरूपी द्रव्यो छे. ते सघळा मनना विषय छे. परंतु ए सौथी भिन्न चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मा हुं छुं एम अंतर्द्रष्टि नहि थवाथी अज्ञानी मनने अने मनना विषयने एक करतो त्यां ज रोकायेलो होवाथी ज्ञेय-ज्ञायकने एक करे छे. ज्यारे हुं शुद्ध ज्ञायकमूर्ति भगवान आत्मा छुं एम जेने भान थयुं छे एवो ज्ञानी-धर्मी जीव जीवादि परद्रव्यना विचार समये पण हुं परद्रव्यथी भिन्न छुं एवुं भान वर्ततुं होवाथी ज्ञेयज्ञायकने एक करतो नथी. झीणी वात छे भाई!
मनना विषयनी वात करी. हवे इन्द्रियोना विषयनी वात करे छे. इन्द्रियना विषयरूप स्पर्श, रस, गंध, रूप अने शब्द वडे केवळबोधस्वरूप निज आत्मा ढंकाई गयो छे. इन्द्रिय विषयना लक्षे भगवान आत्मा ढंकाई गयो छे. रूपी पदार्थना लक्षे राग थाय छे. अने ते रागने अने विषयने पोतानां मानवाथी केवळज्ञानस्वरूप भगवान आत्मा ढंकाई जाय छे. ढंकाई जाय छे एटले अनुभवमां आवतो नथी. जुओ, अहीं केवळज्ञान पर्यायनी वात नथी. इन्द्रियना विषयो मारा छे एवा विकल्पो वडे शुद्ध ज्ञानस्वरूप परमात्मा पोते छे ते अनुभवमां आवतो नथी एटले ढंकाई जाय छे एम अहीं वात छे.