समयसार गाथा-९६ ] [ प९
हवे त्रीजी वात कहे छे के मृतक कलेवर वडे परम अमृतस्वरूप विज्ञानघन पोते मूर्छित थई गयो छे. जुओ, आ शरीर मृतक कलेवर एटले मडदुं छे एम अहीं कह्युं छे.
प्रश्नः– पण कयारे?
उत्तरः– अत्यारे हमणां ज. शरीर तो स्वरूपथी अचेतन मडदुं ज छे पण जीवना संयोगनी अपेक्षाए तेने उपचारथी सचेत-जीवित कहेवामां आवे छे. वास्तवमां तो जीव होवा छतां पण शरीर तो मृतक कलेवर ज छे, केमके शरीर कदीय जीवरूप-चैतन्यरूप थतुं नथी अने जीव कदीय शरीररूप थतो नथी. जीव सदा जीव ज छे अने शरीर सदा शरीर ज छे. तेथी तेने मृतक कलेवर अर्थात् मडदुं अहीं कह्युं छे.
अहीं कहे छे के परम अमृतरूप विज्ञानघन प्रभु आत्मा अज्ञानने लईने शरीररूप मृतक कलेवरमां-मडदामां मूर्छायो छे. अरे! रातदिवस एने ए मडदानी केटली चिंता! खवडाववुं, पीवडाववुं, ऊंघाडवुं अने एने पुष्ट राखवुं-एम एनी ज संभाळ कर्या करे छे. ए शरीरना लक्षे मूर्छाई गयो छे, बेहोश थई गयो छे. आचार्य कहे छे-भाई! तुं आ मडदे केम मूर्छायो छे? तुं तो अमृतस्वरूप आनंदनो नाथ विज्ञानघन प्रभु छो ने! जागृत था अने स्वरूपनुं भान करी एमां ठरी जा.
आत्मा एकलो ज्ञानस्वरूप अमृतरसनो सागर छे. प्रभु! एनी द्रष्टि छोडी आ देहना- मडदाना रखोपामां कयां रोकायो? चा, दूध, उकाळा, रोटली, दाळ, भात, लाडु वगेरेना खानपानमां तुं एकाकार थई गयो छे ते तारुं अज्ञान छे. चा पीधी होय तो मगज तर रहे अने बीडी पीधी होय तो बराबर केफ रहे. अरे भाई! तुं आ शुं माने छे? आ तो मूढपणुं छे. भगवान! तुं तो सच्चिदानंद प्रभु अमृतनो सागर छुं. तने आ शुं थयुं? शरीरनी सर्व चिंता छोडीने अमृतस्वरूप आत्मानुं भान कर.
जुओ, त्रण वात करी- मनना विषयमां-छ पदार्थना विचारमां चैतन्यधातु रोकाई गई ए एक वात. पांच इन्द्रियना विषयमां केवळ बोध ढंकाई गयो ए बीजी वात.
अने परम अमृतरूप विज्ञानघनस्वभाव मृतक कलेवरमां मूर्छाई गयो ए त्रीजी वात. आ प्रमाणे अज्ञानने लीधे जीव इन्द्रियना विषयमां, मनना विषयमां अने शरीरमां मूर्छाभावने पामेलो होवाथी ते प्रकारना भावनो ते कर्ता प्रतिभासे छे. एटले जे जे प्रकारनो शुभाशुभ राग आवे छे तेनो ते कर्ता थाय छे.
‘आ आत्मा अज्ञानने लीधे, अचेतन कर्मरूप भावकनुं जे क्रोधादि भाव्य तेने