६० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प चेतन भावक साथे एकरूप माने छे; वळी ते, परज्ञेयरूप धर्मादि द्रव्योने पण ज्ञायक साथे एकरूप माने छे, तेथी ते सविकार अने सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे.’
आ आत्मा पोताना स्वरूपना भान विना अचेतन कर्मरूप भावकनुं जे क्रोधादि भाव्य तेने चेतन भावक साथे एकरूप माने छे. शुं कहे छे? अचेतन कर्म छे ते भावक छे अने पुण्यपापना भाव ते एनुं भाव्य छे. स्वभावनी रुचि विना जे शुभाशुभ भाव थाय ते अचेतन मोहकर्मनुं भाव्य छे. परंतु एम न मानतां ते विकारी भाव्यने चेतन भावकनुं भाव्य माने छे. शुभाशुभ भावनो करनार खरेखर तो जडकर्म छे. आ द्रव्यद्रष्टि कराववानी वात छे. पुण्यपापनी परिणति उत्पन्न तो जीवनी पर्यायमां थाय छे अने ते पोताना षट्कारकनी परिणतिथी पोतामां स्वतंत्रपणे थाय छे; ते पर्याय कांई परथी थाय छे एम नथी. पण अहीं द्रव्यद्रष्टि कराववी छे एटले एम कहे छे के पर्यायमां जे विकार थाय छे निमित्तने वश थतां थाय छे. माटे विकारी भाव ते भावक अचेतन कर्मनुं भाव्य छे, ते चेतन भावकनुं भाव्य नथी.
क्रोध, मान, माया, लोभ, पुण्य-पाप इत्यादि रागपरिणाम बधा अचेतन भावकनुं - जडकर्मनुं भाव्य छे. चेतन भावक भगवान आत्मा तो चैतन्यनी अतीन्द्रिय आनंदनी दशानो करनार छे. भगवान आत्मा भावक अने अतीन्द्रिय आनंदनी दशा ए एनुं भाव्य छे. समकित थतां भगवान आत्मा भावक थईने जे निर्मळ वीतरागी आनंदनी दशा प्रगट करे ते चेतननुं भाव्य छे. परंतु अज्ञानी जीव चेतन भावक साथे विकारी भावने एकरूप माने छे. राग मारी चीज छे, मारुं भाव्य छे, मारुं कर्तव्य छे एम ते माने छे. भगवान आत्मा भावक थईने निर्मळ पर्यायने-शुद्धरत्नत्रयने पोतानुं भाव्य करे एवो तेनो स्वभाव छे. परंतु स्वभावने छोडीने जाणे चेतन भावकनुं विकार भाव्य छे एम मानी अज्ञानी जीव विकारनो कर्ता थाय छे.
अहाहा...! चेतन कोण, राग कोण अने पोतानुं स्वरूप शुं? इत्यादि स्पष्ट वात दिगंबर संतो सिवाय कोई ए करी नथी. भगवान आत्मा विज्ञानघन प्रभु अविकारी अनुभूतिमात्र भावक छे. अने तेना लक्षे जे वीतरागी आनंद अने शान्तिनी दशा प्रगट थाय ते एनुं भाव्य छे. वीतरागी आनंदनी पर्याय प्रगट करवी ए सम्यग्द्रष्टिनुं कर्तव्य छे. धर्मी जीव राग अने परनी क्रियानो कदीय कर्ता थतो नथी. बहु सूक्ष्म वात भाई! परंतु आत्माने अनुचित-अशोभनीक एवा विकारी भावने पोताना मानीने अज्ञानी ते भावनो कर्ता थाय छे. सम्यग्दर्शन अने मिथ्यादर्शन शुं चीज छे ए अहीं बताववुं छे. राग अने परवस्तु मारी छे एवुं मानीने भावक जड कर्मनुं भाव्य जे शुभाशुभ विकारी भाव तेनो अज्ञानी कर्ता थाय छे. विकारी भाव जे जडकर्मनुं कर्तव्य छे तेने अज्ञानी पोतानुं कर्तव्य माने छे. रे अज्ञान! धर्मीनुं तो वीतरागी परिणाम कर्तव्य छे.