समयसार गाथा-९६ ] [ ६१
पोताना ज्ञायकभावने भूलीने परज्ञेय (छ द्रव्य) मारां छे एम विचारतां जे विकल्प उत्पन्न थाय छे ते कर्मरूपी भावकनुं भाव्य छे. तेने पोतानुं भाव्य मानी अज्ञानी जीव शुभाशुभ विकल्पनो कर्ता थाय छे. शरीरनो कर्ता के देशनो कर्ता तो जीव कदीय छे नहि. स्त्री-कुटुंबनुं पालन करवुं, समाजनी सेवा करवी अने देशनुं रक्षण करवुं इत्यादि कर्तव्य जीवनुं कदीय नथी. छ द्रव्यरूप परज्ञेयने पोताना मानी जे मिथ्यात्व अने रागादिना भाव उत्पन्न करे ते भावनो अज्ञानपणे ते कर्ता थाय छे ते भाव एनुं कर्तव्य छे, पण परद्रव्यनी क्रिया थाय ते एनुं कर्तव्य नथी. निश्चयथी तो ए विकारभाव जडकर्म जे भावक एनुं भाव्य छे. जो ते आत्मानुं भाव्य होय तो ते एनाथी कदीय छूटे नहि. अहीं अचेतन कर्म भावक अने विकारी दशा एनुं भाव्य छे एम कह्युं छे.
प्रश्नः- तो शुं विकार जीवनी पर्याय नथी, जीवनुं कार्य नथी?
उत्तरः– अरे भाई! विकारी परिणाम पोतानी-जीवनी पर्यायमां थाय छे एम जेणे नक्की कर्युं छे तेने स्वभावनी द्रष्टि कराववा माटे विकारी परिणाम तारुं-जीवनुं कर्तव्य नथी एम कह्युं छे. विकारना परिणाम स्वयं पोताना षट्कारकथी जीवनी पर्यायमां थाय छे, ते कर्मनुं कार्य छे वा कर्मना करावेला थाय छे एम बीलकुल नथी, आवो निर्णय जेने थयो छे तेने विकारनुं लक्ष छोडावी द्रष्टिनो विषय जे शुद्ध चैतन्यमय ध्रुव आत्मा तेनो आश्रय कराववा द्रव्यद्रष्टिनी अपेक्षाए तेने जडकर्मरूपी भावकनुं भाव्य कह्युं छे. विकार कर्मना संगे थाय छे अने शुद्ध द्रव्यनी द्रष्टि थतां नीकळी जाय छे तेथी तेने प्रयोजनवश जडकर्मरूपी भावकनुं भाव्य कह्युं छे. भाई! ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय त्यां ते अपेक्षापूर्वक यथार्थ समजवुं जोईए.
अज्ञानीनी द्रष्टि राग अने पर उपर छे. पोते शुद्ध चैतन्यमूर्ति ज्ञायक भगवान छे एना उपर एनी द्रष्टि नथी. तेथी तेने कह्युं के आ जे पर्यायमां राग छे ते अचेतन जडकर्मरूपी भावकनुं भाव्य छे. तुं तो शुद्ध चैतन्यमूर्ति छो. तारुं ए भाव्य केम होय? भाई! दया, दान, व्रतादिना विकल्प हो के अशुभभावना विकल्प हो-ए बधुं पुद्गलनुं -कर्मनुं कार्य छे, चेतननुं कार्य नथी. अज्ञानी ते विकारी भावने चेतन भावकनी साथे एकरूप करीने ते ते प्रकारना विकारी भावनो कर्ता थाय छे.
अहो! आ समयसारशास्त्र कोई अद्भुत, अलौकिक चीज छे! तेने समजवा खूब शांति अने धीरज केळववां जोईए अने तेनो गंभीर जिज्ञासाथी स्वाध्याय करवो जोईए. मात्र उपलक वांची जाय तो ते समजाय एम नथी. दरेक द्रव्यनी विकारी के निर्विकारी पर्याय स्वतंत्रपणे पोताना षट्कारकथी परिणमे छे. त्यां तो पर्यायनुं स्वतंत्र अस्तिपणुं सिद्ध करवानी वात छे. (त्यां पण पर्यायनुं लक्ष छोडावी द्रव्यद्रष्टि कराववानुं प्रयोजन छे). अने अहीं रागने कर्मनुं कार्य कहीने रागथी भेदज्ञान करावी त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यनी द्रष्टि कराववानी वात छे.