Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

अहाहा...! भगवान आत्मा आनंदनो नाथ प्रभु एकला आनंदनुं ढीम-चोसलुं छे. तेना लक्षे प्रगट थतो धर्म धर्मीनुं कर्तव्य छे. धर्मीने लडाईना परिणाम, विषय-वासनाना परिणाम कमजोरीवश थाय छे तोपण धर्मी तेना ज्ञाता रहे छे, कर्ता थता नथी. बहु सूक्ष्म वात भाई! परंतु अज्ञानी पुण्यपापना भाव जे अचेतन मोहकर्मनुं भाव्य छे ते जाणे पोतानुं कर्तव्य छे एम मानतो होवाथी ते ते भावनो ते कर्ता थाय छे. परनुं कार्य हुं करुं, परने मारुं, परने जीवाडुं, परनी रक्षा करुं इत्यादि माननार मिथ्याद्रष्टि मूढ छे. अरे! पोतानी दया पाळे नहि अने परनी दयानो शुभराग आवे तेने पोतानुं कर्तव्य माने छे ते पोतानी हिंसा करे छे. अमृतचंद्रस्वामीए पुरुषार्थ-सिद्धयुपायमां रागने हिंसा कही छे. भाई! तने बहारमां कोई शरण नथी. (अने तुं पण कोई अन्यनुं शरण नथी.) अंतरंगमां प्रगट बिराजमान चैतन्यमूर्ति भगवान आनंदनो नाथ एक ज तने शरण छे. त्यां द्रष्टि कर तो शरण मळे तेम छे. अरहंतादि जे चत्तारि शरण कहेवाय छे ए व्यवहारथी शरण कहेला छे. भाई! आवो ज वीतरागनो मार्ग छे.

‘वळी ते, परज्ञेयरूप धर्मादि द्रव्योने पण ज्ञायक साथे एकरूप माने छे.’ छ द्रव्योना विचारना विकल्पमां एकाकारपणे तल्लीन थाय छे ते परद्रव्यने पोताना माने छे.

भाई! अनंता निगोदना जीव अने अनंता सिद्धोने ज्ञाननी एक पर्याय जाणे ते पर्यायनुं सामर्थ्य केटलुं? निगोदना जीवने बचावी शके के तेमनी दया पाळी शके ए वात नथी; पण अनंतनी सत्ताने अनंतपणे जाणे ए ज्ञाननी पर्यायनुं कोई अद्भुत अचिंत्य सामर्थ्य छे. अरे भाई! अनंता सिद्ध भगवंतो भक्ति करवा योग्य छे माटे शास्त्रमां एनुं कथन छे एम नथी; तेमज जे अनंत निगोदना जीवो छे तेमनी दया पाळवी योग्य छे माटे शास्त्रमां तेमनुं कथन छे एम नथी. तो शी रीते छे? अहाहा...! प्रभु! तारी ज्ञाननी पर्यायमां आटला अनंत ज्ञेयो जाणवामां आवे एवुं तारी ज्ञाननी पर्यायनुं स्वपरप्रकाशक अचिंत्य सामर्थ्य छे ए समजाववा शास्त्रमां आ वात करी छे अनंत परद्रव्य छे ते ज्ञेय छे अने भगवान आत्मा ज्ञायक-ज्ञायक जाणगस्वभावी छे. ज्ञानी अनंता परज्ञेयने जाणतो थको ज्ञाता रहे छे. अने अज्ञानी ज्ञेय अने ज्ञायकने एकरूप करतो थको शुभाशुभ विकल्पोने उपजावतो एवो ते सविकार अने सोपाधिक चैतन्यपरिणामनो कर्ता थाय छे. अहो! गजब वात छे!

क्रोधादिक भाव ते सविकार चैतन्यपरिणाम छे अने धर्मास्तिकाय आदि छ द्रव्य मारां छे एम माने ते सोपाधिक चैतन्यपरिणाम छे. अज्ञानी, राग मारो छे एम मानी