Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-९६ ] [ ६३ रागनो कर्ता थाय छे अने परद्रव्य मारां छे एम मानी ते मिथ्या मान्यतानो कर्ता थाय छे. परद्रव्यनो कर्ता तो कदीय कोई जीव थई शक्तो नथी. परनी दया पाळी शके के परने जीवाडी शके ए तो वस्तुनुं स्वरूप ज नथी. ते पर जीवनुं आयुष्य होय तो ते बचे अने तेनुं आयु पूरुं थाय तो देह छूटी जाय. एमां तुं शुं करी शके? शुं तुं एने आयुष्य दई शके छे? शुं तुं एनुं आयुष्य हरी शके छे? ना. तो हुं परजीवने बचावुं के मारुं ए मान्यता तारी मिथ्या छे. भाई! भगवान जिनेश्वरनो मार्ग आखी दुनियाथी जुदो छे. अरे! वाडामां जन्म्या तेने पण मार्गनी खबर नथी! अरेरे! एम ने एम जिंदगी व्यर्थ चाली जाय छे!

प्रश्नः– मुनिराज छ कायना जीवनी रक्षा करे छे एम शास्त्रमां आवे छे ने?

उत्तरः– भाई! शास्त्रमां व्यवहारनयथी ए कथन आवे छे. मुनिराज त्रण कषायना

अभावरूप अकषाय परिणतिना स्वदयाना स्वामी छे. तेमने परजीवनी हिंसानो विकल्प होतो नथी अने परजीवनी दयानो विकल्प कदाचित् थाय तेना ते स्वामी थता नथी, मात्र ज्ञाता रहे छे. तेथी व्यवहारथी मुनिराज छ कायना जीवनी रक्षा करे छे एम कथन करवामां आवे छे. ज्यां जे अपेक्षा होय ते यथार्थ समजवी जोईए.

आ रळवुं-कमावुं अने वेपारधंधा करवा तथा बेरां-छोकरांने साचववां इत्यादि प्रवृत्तिमां रोकाई गयो ते मजूरनी जेम पापनी मजूरीमां काळ गुमावे छे. अज्ञानी रागनो कर्ता छे पण बहारनां परनां कार्योनो तो कर्ता कदीय नथी. कारखानामां लादी बने ते जडनी क्रिया छे. ते क्रिया आत्मा करी शके नहि. जडनी क्रियानो स्वामी तो जड छे. तेनो स्वामी शुं जीव थाय? तथापि जडनी क्रियानो स्वामी पोताने माने ते मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. भाई! एक द्रव्य बीजा द्रव्यनी क्रिया करे ए त्रणकाळमां संभवित नथी, केमके एक द्रव्यमां बीजा द्रव्यनो अभाव छे. एक द्रव्य बीजा द्रव्यने अडकतुं नथी. पोताना स्वद्रव्यमां परनो, शरीरनो, लक्ष्मीनो अभाव छे. माटे आत्मा परनुं कांई करतो नथी अने परद्रव्यो आत्मानुं कांई करतां नथी. दरेक द्रव्य स्वतंत्र पोताथी टकी रह्युं छे अने परिणमी रह्युं छे. कोई द्रव्य कोई अन्य द्रव्यना परिणामनुं कर्ता त्रणकाळमां नथी. आवी ज वस्तुस्थिति छे. माटे हे भाई! पर विना मारे चाले नहि एवी मान्यता छोडी दे. तने खबर नथी पण अनंतकाळमां तें पर विना ज चलाव्युं छे. पोतानी मान्यता विपरीत छे तेथी अज्ञानीने लागे छे के पर विना चाले नहि.

आत्मा पोताना द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावरूप स्वचतुष्टयमां रहेलो छे. परना द्रव्य-क्षेत्र- काळ-भावरूप परचतुष्टयमां आत्मा रहेलो नथी. माटे पर विना ज प्रत्येक जीवे चलाव्युं छे. परनो तारामां अभाव छे. ते अभावथी तारो स्वभाव टके एवुं केम बने? न बने.