६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प आ एक आंगळी पोताथी टकी छे. तेमां बीजी आंगळीने अभाव छे. भाई! पहेलां आ वातनी हा तो पाड. पर विना चाले नहि ए तो मूढ मिथ्याद्रष्टिनी मान्यता छे; तेने जैनदर्शननी श्रद्धा नथी.
परने सहाय करी शकुं, परने सुखी करी शकुं, परने जीवाडी शकुं-ए बधो मिथ्याद्रष्टिनो भ्रम छे. अज्ञानी पोताना विकारी परिणामनो कर्ता थाय छे पण परद्रव्यनां जे कार्य थाय तेनो कदीय कर्ता नथी.
अहीं, क्रोधादिक साथे एकपणानी मान्यताथी उत्पन्न थतुं र्क्तृत्व समजाववा भूताविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत कह्युं अने धर्मादिक अन्यद्रव्यो साथे एकपणानी मान्यताथी उत्पन्न थतुं र्क्तृत्व समजाववा ध्यानाविष्ट पुरुषनुं द्रष्टांत कह्युं छे.