ततः स्थितमेतद् ज्ञानान्नश्यति कर्तृत्वम्–
एवं खलु जो जाणदि सो मुंचदि सव्वकत्तित्तं।। ९७ ।।
एवं खलु यो जानाति सो मुञ्चति सर्वकर्तृत्वम्।। ९७ ।।
‘तेथी (पूर्वोक्त कारणथी) ए सिद्ध थयुं के ज्ञानथी कर्तापणानो नाश थाय छे’ एम हवे कहे छेः-
–ए ज्ञान जेने थाय ते छोडे सकल कर्तृत्वने. ९७.
गाथार्थः– [एतेन तु] आ (पूर्वोक्त) कारणथी [निश्चयविद्भिः] निश्चयना जाणनारा ज्ञानीओए [सः आत्मा] ते आत्माने [कर्ता] कर्ता [परिकथितः] कह्यो छे-[एवं खलु] आवुं निश्चयथी [यः] जे [जानाति] जाणे छे [सः] ते (ज्ञानी थयो थको) [सर्वकर्तृत्वम्] सर्व र्क्तृत्वने [मुञ्चति] छोडे छे.
टीकाः– कारण के आ आत्मा अज्ञानने लीधे परना अने पोताना एकपणानो आत्मविकल्प करे छे तेथी ते निश्चयथी कर्ता प्रतिभासे छे-आवुं जे जाणे छे ते समस्त कर्तृत्वने छोडे छे तेथी ते निश्चयथी अकर्ता प्रतिभासे छे. ते स्पष्ट समजाववामां आवे छेः-
आ आत्मा अज्ञानी थयो थको, अज्ञानने लीधे अनादि संसारथी मांडीने मिलित (-एकमेक मळी गयेला) स्वादनुं स्वादन-अनुभवन होवाथी (अर्थात् पुद्गलकर्मना अने पोताना स्वादनुं भेळसेळपणे-एकरूपे अनुभवन होवाथी), जेनी भेदसंवेदननी (भेदज्ञाननी) शक्ति बिडाई गयेली छे एवो अनादिथी ज छे; तेथी ते परने अने पोताने एकपणे जाणे छे; तेथी ‘हुं क्रोध छुं’ इत्यादि आत्मविकल्प (पोतानो विकल्प) करे छे; अने तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघन (स्वभाव)थी भ्रष्ट थयो थको वारंवार अनेक विकल्परूपे परिणमतो थको कर्ता प्रतिभासे छे.
अने ज्यारे आत्मा ज्ञानी थाय त्यारे, ज्ञानने लीधे ज्ञानना आदिथी मांडीने पृथक् पृथक् स्वादनुं स्वादन-अनुभवन होवाथी (अर्थात् पुद्गलकर्मना अने पोताना स्वादनुं