Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

(वसंततिलका)
अज्ञानतस्तु सतृणाभ्यवहारकारी
ज्ञानं स्वयं किल भवन्नपि रज्यते यः।
पीत्वा दधोक्षुमधुराम्लरसातिगृद्धया
गां दोग्धि दुग्धमिव नूनमसौ रसालम्।। ५७ ।।

एकरूपे नहि पण-भिन्नभिन्नपणे अनुभवन होवाथी), जेनी भेदसंवेदनशक्ति ऊघडी गई छे एवो होय छे; तेथी ते जाणे छे के “अनादिनिधन, निरंतर स्वादमां आवतो, समस्त अन्य रसथी विलक्षण (भिन्न), अत्यंत मधुर जे चैतन्यरस ते ज एक जेनो रस छे एवो आ आत्मा छे अने कषायो तेनाथी भिन्न रसवाळा (कषायला-बेस्वाद) छे; तेमनी साथे जे एकपणानो विकल्प करवो ते अज्ञानथी छे;” आ रीते परने अने पोताने भिन्नपणे जाणे छे; तेथी ‘अकृत्रिम (नित्य), एक ज्ञान ज हुं छुं परंतु कृत्रिम (अनित्य), अनेक जे क्रोधादिक ते हुं नथी’ एम जाणतो थको ‘हुं क्रोध छुं’ इत्यादि आत्मविकल्प जरा पण करतो नथी; तेथी समस्त कर्तृत्वने छोडी दे छे; तेथी सदाय उदासीन अवस्थावाळो थयो थको मात्र जाण्या ज करे छे; अने तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघन थयो थको अत्यंत अकर्ता प्रतिभासे छे.

भावार्थः– जे परद्रव्यना अने परद्रव्यना भावोना कर्तृत्वने अज्ञान जाणे ते पोते कर्ता

शा माटे बने? अज्ञानी रहेवुं होय तो परद्रव्यनो कर्ता बने! माटे ज्ञान थया पछी परद्रव्यनुं कर्तापणुं रहेतुं नथी.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

श्लोकार्थः– [किल] निश्चयथी [स्वयं ज्ञानं भवन् अपि] स्वयं ज्ञानस्वरूप होवा छतां [अज्ञानतः तु] अज्ञानने लीधे [यः] जे जीव, [सतृणाभ्यवहारकारी] घास साथे भेळसेळ सुंदर आहारने खानारा हाथी आदि तिर्यंचनी माफक, [रज्यते] राग करे छे (अर्थात् रागनो अने पोतानो भेळसेळ स्वाद ले छे) [असौ] ते, [दधीक्षुमधुराम्लरसातिगृद्धया] दहीं- खांडना अर्थात् शिखंडना खाटा-मीठा रसनी अति लोलुपताथी [रसालम् पीत्वा] शिखंडने पीतां छतां [गां दुग्धम् दोग्धि इव नूनम्] पोते गायना दूधने पीए छे एवुं माननार पुरुषना जेवो छे.

भावार्थः– जेम हाथीने घासना अने सुंदर आहारना भिन्न स्वादनुं भान नथी तेम अज्ञानीने पुद्गलकर्मना अने पोताना भिन्न स्वादनुं भान नथी; तेथी ते एकाकारपणे रागादिमां वर्ते छे. जेम शिखंडनो गृद्धी माणस, स्वादभेद नहि पारखतां, शिखंडना स्वादने मात्र दूधनो स्वाद जाणे तेम अज्ञानी जीव स्व-परना भेळसेळ स्वादने पोतानो स्वाद जाणे छे. प७.