समयसार गाथा-९७ ] [ ६७
अज्ञानात्तमसि द्रवन्ति भुजगाध्यासेन रज्जौ जनाः।
अज्ञानाच्च विकल्पचक्रकरणाद्वातोत्तरङ्गाब्धिवत्
शुद्धज्ञानमया अपि स्वयममी कर्त्रीभवन्त्याकुलाः।। ५८ ।।
जानाति हंस इव वाःपयसोर्विशेषम्।
चैतन्यधातुमचलं स सदाधिरूढो
जानीत एव हि करोति न किञ्चनापि।। ५९ ।।
अज्ञानथी ज जीवो कर्ता थाय छे एवा अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
श्लोकार्थः– [अज्ञानात्] अज्ञानने लीधे [मृगतृष्णिकां जलधिया] मृगजळमां जळनी बुद्धि थवाथी [मृगाः पातुं धावन्ति] हरणो तेने पीवा दोडे छे; [अज्ञानात्] अज्ञानने लीधे [तमसि रज्जौ भुजगाध्यासेन] अंधकारमां पडेली दोरडीमां सर्पनो अध्यास थवाथी [जनाः द्रवन्ति] लोको (भयथी) भागी जाय छे; [च] अने (तेवी रीते) [अज्ञानात्] अज्ञानने लीधे [अमी] आ जीवो, [वातोत्तरङ्गाब्धिवत्] पवनथी तरंगवाळा समुद्रनी माफक [विकल्पचक्रकरणात्] विकल्पोना समूह करता होवाथी- [शुद्धज्ञानमयाः अपि] जोके तेओ शुद्धज्ञानमय छे तोपण-[आकुलाः] आकुळता बनता थता [स्वयम्] पोतानी मेळे [कर्त्रीभवन्ति] कर्ता थाय छे.
भावार्थः– अज्ञानथी शुं शुं नथी थतुं? हरणो झांझवांने जळ जाणी पीवा दोडे छे अने ए रीते खेदखिन्न थाय छे. अंधारामां पडेला दोरडाने सर्प मानीने माणसो डरीने भागे छे. तेवी ज रीते आ आत्मा, पवनथी क्षुब्ध थयेला समुद्रनी माफक, अज्ञानने लीधे अनेक विकल्पो करतो थको क्षुब्ध थाय छे अने ए रीते-जोके परमार्थे ते शुद्धज्ञानघन छे तोपण- अज्ञानथी कर्ता थाय छे. प८.
ज्ञानथी आत्मा कर्ता थतो नथी एम हवे कहे छेः-
श्लोकार्थः– [हंसः वाःपयसोः इव] जेम हंस दूध अने पाणीना विशेषने (तफावतने) जाणे छे तेम [यः] जे जीव [ज्ञानात्] ज्ञानने लीधे [विवेचकतया] विवेकवाळो (भेदज्ञानवाळो) होवाथी [परात्मनोः तु] परना अने पोताना [विशेषम्] विशेषने [जानाति] जाणे छे [सः] ते (जेम हंस मिश्रित थयेलां दूधजळने जुदां