Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प

(मंदाक्रान्ता)
ज्ञानादेव ज्वलनपयसोरौष्ण्यशैत्यव्यवस्था
ज्ञानादेवोल्लसति लवणस्वादभेदव्युदासः।
ज्ञानादेव स्वरसविकसन्नित्यचैतन्यधातोः
क्रोधादेश्च प्रभवति भिदा भिन्दती कर्तृभावम्।। ६० ।।

(अनुष्टुभ्)
अज्ञानं ज्ञानमप्येवं कुर्वन्नात्मानमञ्जसा।
स्यात्कर्तात्मात्मभावस्य परभावस्य न क्वचित्।। ६१ ।।

करीने दूध ग्रहण करे छे तेम) [अचलं चैतन्यधातुम्] अचळ चैतन्यधातुमां [सदा] सदा [अधिरूढः] आरूढ थयो थको (अर्थात् तेनो आश्रय करतो थको) [जानीत एव हि] मात्र जाणे ज छे, [किञ्चन अपि न करोति] कांई पण करतो नथी (अर्थात् ज्ञाता ज रहे छे, कर्ता थतो नथी).

भावार्थः– जे स्व-परनो भेद जाणे ते ज्ञाता ज छे, कर्ता नथी. प९.

हवे, जे कांई जणाय छे ते ज्ञानथी ज जणाय छे एम कहे छेः-

श्लोकार्थः– [ज्वलन–पयसोः औष्णय–शैत्य–व्यवस्था] (गरम पाणीमां) अग्निनी उष्णतानो अने पाणीनी शीतळतानो भेद [ज्ञानात् एव] ज्ञानथी ज प्रगट थाय छे. [लवणस्वादभेदव्युदासः ज्ञानात् एव उल्लसति] लवणना स्वादभेदनुं निरसन (-निराकरण, अस्वीकार, उपेक्षा) ज्ञानथी ज थाय छे (अर्थात् ज्ञानथी ज शाक वगेरेमांना लवणनो सामान्य स्वाद तरी आवे छे अने तेनो स्वादविशेष निरस्त थाय छे). [स्वरसविकसन्नित्यचैतन्यधातोः च क्रोधादेः भिदा] निज रसथी विकसती नित्य चैतन्यधातुनो अने क्रोधादि भावोनो भेद, [कर्तृभावम् भिन्दती] र्क्तृत्वने (कर्तापणाना भावने) भेदतो थको-तोडतो थको, [ज्ञानात् एव प्रभवति] ज्ञानथी ज प्रगट थाय छे. ६०.

हवे, अज्ञानी पण पोताना ज भावने करे छे परंतु पुद्गलना भावने कदी करतो नथी- एवा अर्थनो, आगळनी गाथानी सूचनिकारूप श्लोक कहे छेः-

श्लोकार्थः– [एवं] आ रीते [अञ्जसा] खरेखर [आत्मानम्] पोताने [अज्ञानं ज्ञानम् अपि] अज्ञानरूप के ज्ञानरूप [कुर्वन्] करतो [आत्मा आत्मभावस्य कर्ता स्यात्] आत्मा पोताना ज भावनो कर्ता छे, [परभावस्य] परभावनो (पुद्गलना भावोनो) कर्ता तो [क्वचित् न] कदी नथी. ६१.