समयसार गाथा-९७ ] [ ६९
परभावस्य कर्तात्मा मोहोऽयं व्यवहारिणाम्।। ६२ ।।
ए ज वातने द्रढ करे छेः-
श्लोकार्थः– [आत्मा ज्ञानं] आत्मा ज्ञानस्वरूप छे, [स्वयं ज्ञानं] पोते ज्ञान ज छे; [ज्ञानात् अन्यत् किम् करोति] ते ज्ञान सिवाय बीजुं शुं करे? [आत्मा परभावस्य कर्ता] आत्मा परभावनो कर्ता छे [अयं] एम मानवुं (तथा कहेवुं) ते [व्यवहारिणाम् मोहः] व्यवहारी जीवोनो मोह (अज्ञान) छे. ६र.
‘तेथी (पूर्वोक्त कारणथी) ए सिद्ध थयुं के ज्ञानथी कर्तापणानो नाश थाय छे’ अज्ञानथी कर्तापणुं छे, ते कर्तापणानो ज्ञान वडे नाश थाय छे. हुं ज्ञाताद्रष्टा भगवान सच्चिदानंदस्वरूप छुं एवा अनुभवथी र्क्तृत्वनो नाश थाय छे अने ते धर्म छे एम हवे कहे छेः-
‘कारण के आ आत्मा अज्ञानने लीधे परना अने पोताना एकपणानो आत्मविकल्प करे छे तेथी ते निश्चयथी कर्ता प्रतिभासे छे-आवुं जे जाणे छे ते समस्त र्क्तृत्वने छोडे छे तेथी ते निश्चयथी अकर्ता प्रतिभासे छे.’
गाथा बहु सरस छे. पोताना शुद्ध ज्ञानानंदस्वभावनुं भान नहि होवाथी अज्ञानने लीधे जीव राग अने परद्रव्य साथे पोताने एक करीने स्वपरना एकत्वनो आत्मविकल्प करे छे अने तेथी निश्चयथी ते कर्ता प्रतिभासे छे. अज्ञानथी रागनो कर्ता छे एम जे यथार्थ जाणे छे ते सकल र्क्तृत्वने छोडी दे छे अर्थात् ते अकर्ता थई जाय छे.
लोको बहारथी छोडवानुं-त्यागवानुं माने छे. आहारनो त्याग करवो ते उपवास माने छे, पण ए उपवास नथी; ए तो लांघण छे. आत्मामां वसे ते उपवास छे. में आहारनो त्याग कर्यो एम जे माने ते मिथ्याद्रष्टि छे केमके आत्मा परना ग्रहण-त्यागथी शून्य छे. जड रजकणने आत्मा कई रीते ग्रहे अने कई रीते त्यागे? में बैरां-छोकरां, धनसंपत्ति इत्यादिनो त्याग कर्यो एवी मान्यता मिथ्याद्रष्टिनी छे. परिशिष्टमां ४७ शक्तिनुं वर्णन छे. तेमां एक सोळमी त्यागोपादानशून्यत्व शक्ति कहेली छे. त्यां कह्युं छे-‘‘जे घटतुं-वधतुं नथी एवा स्वरूपमां नियतत्वरूप (-निश्चितपणे जेमनुं तेम रहेवारूप) त्यागोपादानशून्यत्व शक्ति.’’ जुओ, आत्मा परनुं ग्रहण अने परनो त्याग करे-एनाथी