Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प शून्य छे. रजकणोने ग्रह्या नथी अने रजकणोने आत्मा छोडतो नथी. पर्यायमां अज्ञाननुं ग्रहण कर्युं छे अने ते अज्ञानने छोडे छे. परंतु जे परनो त्याग में कर्यो छे एम माने छे तेणे समकित छोडयुं छे अने मिथ्यात्वनुं ग्रहण कर्युं छे.

जैन परमेश्वर देवाधिदेव सर्वज्ञदेव धर्मसभामां-गणधरो अने इन्द्रोनी सभामां जे दिव्यध्वनिमां कहेता हता ते आ वात छे. जेम ज्ञान आत्मानो त्रिकाळी गुण छे तेम परना त्याग-ग्रहणथी शून्य एवी आत्मानी त्रिकाळी शक्ति-गुण छे. माटे आत्मा परने कदीय ग्रहतो छोडतो नथी ए मूळ मुदनी वात छे. आम यथार्थ जाणी जे स्वपरने एक करतो नथी पण परने पररूप जाणी स्वरूपमां-चैतन्यस्वभावमय पोतानी वस्तुमां लीन थाय छे ते पोताने एकने अनुभवे छे अने ए रीते सकल र्क्तृत्वने छोडी दे छे. ते स्पष्ट समजाववामां आवे छेः-

‘आ आत्मा अज्ञानी थयो थको, अज्ञानने लीधे अनादि संसारथी मांडीने मिलित (एकमेक मळी गयेला) स्वादनुं स्वादन-अनुभवन होवाथी (अर्थात् पुद्गलकर्मना अने पोताना स्वादनुं भेळसेळपणे-एकरूपे अनुभवन होवाथी), जेनी भेदसंवेदननी (भेद-ज्ञाननी) शक्ति बीडाई गयेली छे एवो अनादिथी ज छे; तेथी ते परने अने पोताने एकपणे जाणे छे; तेथी ‘‘हुं क्रोध छुं’’ इत्यादि आत्मविकल्प (पोतानो विकल्प) करे छे; अने तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघन (स्वभाव)थी भ्रष्ट थयो थको वारंवार अनेक विकल्परूपे परिणमतो थको कर्ता प्रतिभासे छे.’

पोतानी ज्ञानानंदस्वरूप त्रिकाळी चीजनुं अभान ते अज्ञान छे. आ अज्ञान नवुं नथी पण अनादिथी छे. अनादि संसारथी एणे पोतानी शुद्ध चिद्रूप वस्तुनी द्रष्टि करी नथी. तेथी अज्ञानने कारणे तेने मिलित स्वादनो अनुभव छे. अनादि निगोदथी मांडीने पोतानी ज्ञाननी पर्यायमां रागद्वेषना विकल्पनी आकुळतानो स्वाद अज्ञानीने आवे छे. अज्ञानने कारणे-एम कह्युं छे एटले कर्मने कारणे नहि एम अर्थ छे. जीव अनादिकाळथी अज्ञानने कारणे पुण्यपाप अने शुभाशुभभावनी आकुळतानो-दुःखनो स्वाद लई रह्यो छे. ‘मिलित स्वाद’ एटले कांईक आत्माना आनंदनो स्वाद अने कांईक रागनो-विकल्पनो आकुळतामय स्वाद एम अर्थ नथी. अज्ञानीने आत्मानो आनंद कयां छे? ‘मिलित स्वाद’ एम शब्द छे एनो अर्थ एम छे के ज्ञाननी पर्याय पोतानी छे तेमां शुभाशुभ-रागनो एकमेकपणे जे अनुभव छे ते पौद्गलिक विकारनो स्वाद तेने छे; तेने मिलित स्वाद कह्यो छे.

राग छे ते पुद्गलनी अवस्था छे. अज्ञानी ते रागनो स्वाद ले छे, ते जगतनी अन्य चीजोनो स्वाद लेतो नथी. लाडु, जलेबी, मैसुब, द्राक्ष, मोसंबी, स्त्रीनुं शरीर इत्यादि परचीजोनो स्वाद जीवने होतो नथी, पण परचीजने ठीक-अठीक मानी जे रागद्वेष करे ते रागद्वेषनो ते स्वाद ले छे. पोताना चैतन्यस्वभावथी भ्रष्ट थईने दया, दान, व्रत,