समयसार गाथा-९७ ] [ ७१ भक्ति आदि शुभभाव जे दुःखरूप छे तेनो स्वाद जे ले छे ते मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. शुभराग ए कांई चैतन्यनी स्वभावरूप अवस्था नथी अने तेथी तेने पुद्गलनी अवस्था कही छे. अज्ञानी जीव पुद्गलनी अवस्था एटले के रागद्वेषना जे भाव तेनो स्वाद ले छे. आवुं ज मिथ्याद्रष्टिनुं लक्षण छे.
अगियार अंग अने नवपूर्वनुं ज्ञान भले होय, पण ज्यां सुधी रागना स्वादनो अनुभव करे छे त्यां सुधी ते मिथ्याद्रष्टि छे. भगवान आत्मा त्रिकाळी चिदानंदस्वरूप प्रभु छे. तेनी सन्मुख थई झुकाव कदी कर्यो नथी एवो अज्ञानी पांचमहाव्रत, पांच समिति, त्रण गुप्ति आदि अठ्ठावीस मूलगुण पाळे तोपण ते बधो शुभराग होवाथी ते दुःखनो स्वाद अनुभवे छे, लेशमात्र सुखनो स्वाद तेने नथी. छहढालामां कह्युं छे के-
अहाहा...! नवमी ग्रीवक जाय एवा शुभभाव एणे अनंतवार कर्या पण शुद्ध चैतन्यस्वरूपनुं भान कर्या विना अनंतकाळमां ते लेश पण सुख न पाम्यो. मतलब के दुःख ज पाम्यो. अरे भाई! शुभभाव करीने पण एणे अनादिथी दुःखनो ज स्वाद अनुभव्यो छे.
प्रश्नः– आ बधा शेठीआ अने स्वर्गना देव तो सुखी छे ने?
उत्तरः– अरे भाई! आ बधा शेठीआ अने स्वर्गना देव विषयोनी चाहना दाहथी बळी रह्या छे. तेओ बिचारा दुःखी ज दुःखी छे. जेने पोताना आनंदस्वरूप आत्मानुं भान नथी ते बधाने पुण्यपापना भावनो स्वाद आवे छे अने ते आकुळतामय दुःखनो ज स्वाद छे.
पुद्गलकर्मना अने पोताना स्वादनुं भेळसेळपणे-एकरूपे अनुभवन होवाथी अज्ञानीनी भेदसंवेदननी शक्ति बिडाई गई छे. अज्ञानीने आत्माना स्वादनो (ज्ञाननो) तो अंश पण नथी. रागने-पुण्यपापना भावने अने पोताने (ज्ञानने) एकमेक करतो होवाथी तेने बन्नेना भेदसंवेदननी शक्ति अस्त थई गई छे. रागथी भिन्न निर्मळ ज्ञानानंदस्वभावी पोतानी चीज छे एवुं भेदज्ञान करवानी एनी शक्ति बिडाई गई छे. एटले के तेने रागमां एक्ता थई गई छे. परंतु राग चाहे शुभ हो के अशुभ हो-ते आकुळता उपजावनारो दुःखस्वरूप ज छे. अहीं शुभरागनी प्रधानताथी वात छे केमके शुभमां धर्म मानीने अज्ञानी अनंतकाळथी दुःखी थई रह्यो छे.
बाह्य तपश्चर्यामां जे राग छे ते आकुळतानो स्वाद छे, दुःख छे. ते कांई खरी तपश्चर्या नथी. जेमां स्वभावनुं प्रतपन थईने निराकुळ आनंदनो स्वाद आवे तेनुं नाम तप छे. शुद्ध चैतन्यस्वरूपनुं भान न होय अने महिना-महिनाना बहारथी उपवास करे