Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प तो ते कांई तप नथी. ए तो राग छे, अपवास छे. एकला शुभरागमां रोकाई रहे ए तो अपवास एटले माठो वास छे, दुःखमां वास छे.

आत्माना आनंदना अनुभव विना अर्थात् सम्यग्दर्शन विना जेटलो क्रियाकांडनो राग छे ते बधो दुःखरूप छे अने ते पुद्गलनो स्वाद छे. अज्ञानीने रागनी एक्ताबुद्धि आडे रागथी भिन्न थवानी भेदज्ञानशक्ति संकोचाई गई छे. पोते निर्मळ आनंदस्वरूप भगवान ज्ञायक छे अने राग तो दुःखस्वरूप छे एम बेने भिन्न पाडनारी भेदज्ञानशक्ति अनादिथी ढंकाई गई छे. आत्मा अने राग एक छे एवी अभेदद्रष्टि एने थई गई छे.

भगवान आत्मा ज्ञायक तत्त्व छे अने शुभाशुभ भाव ते पुण्य-पापरूप आस्रव तत्त्व छे. बन्ने तत्त्व भिन्न भिन्न छे. एक तत्त्व बीजा तत्त्वरूप नथी एम माने तो नव तत्त्व सिद्ध थाय. परंतु अज्ञानीने नव तत्त्वोने भिन्न करवानी शक्ति ढंकाई गई छे. आस्रवथी ज्ञायकने भिन्न पाडवानी एनी शक्ति बीडाई गई छे केमके ते ज्ञायकने अने आस्रवने एकरूप करे छे.

जुओ, आ मुदनी रकमनी वात चाले छे. कोई पंचमहाव्रत पाळे, हजारो राणीओ छोडी जंगलमां रहे पण अंदर रागथी भिन्न पोतानी चीज छे एनुं भान न करे तो ते मिथ्याद्रष्टि छे. अरे भाई! शुभराग करीने तुं अनंतवार नवमी ग्रैवेयक गयो पण अनंतकाळमां आज पर्यंत जे विरस छे एवो रागनो ज तने स्वाद आव्यो छे. जे अशुभ राग छे तेनो स्वाद तो तीव्र महादुःखमय छे. पण पंचमहाव्रतादि जे शुभ-राग छे तेनो स्वाद पण दुःखमय ज छे. अरेरे! पुण्यपापना भावमां एकाकार थईने अज्ञानी जीवो रोकाई गया छे अने आनंदकंद सच्चिदानंदस्वरूप प्रभु अंतरमां बिराजमान छे ते मूळ रकमने भूली गया छे!

भगवान जिनेश्वरदेव धर्मसभामां गणधरो अने इन्द्रोनी उपस्थितिमां जे वात कहेता हता ते वात संतो तेमना आडतिया थईने जगत पासे जाहेर करे छे. कहे छे-प्रभु! तुं शाश्वत आनंदधाम, त्रिकाळी सुखधाम छो, अने आ क्षणिक रागनो रस छे ते आकुळतामय, दुःखमय छे. तने स्वपरना स्वादनी जुदाईनो विवेक नहि होवाथी अर्थात् भेदसंवेदनशक्ति बिडाई गई होवाथी तुं पोताने (ज्ञानने) अने रागने अनादिथी एकमेक करी जाणे छे अने माने छे. प्रभु! आ तें शुं कर्युं? निराकुळ आनंदनो नाथ एवो तुं रागना-दुःखना विरस स्वादमां कयां रोकाई गयो? हे भाई! रागना क्रियाकांडथी मने धर्म थशे एवी मान्यता छोडी अंतर्द्रष्टि कर. पर्यायबुद्धि छोडीने द्रव्यद्रष्टि प्रगट कर.

भगवान पूर्णानंदनो नाथ अनंतसुखनिधान ज्ञायकस्वरूप प्रभु अंतरंगमां सदा विराजमान छे. परंतु अज्ञानीए अंतर्द्रष्टि करी नहि तेथी तेने अनादिथी एकला रागनो स्वाद आवी रह्यो छे. अरे! रागनो स्वाद बेस्वाद छे तोपण तेमां अटकी गयेलो ते