समयसार गाथा-९७ ] [ ७३ स्वपरने एकपणे जाणे छे अने तेथी ‘हुं क्रोध छुं’ इत्यादि आत्मविकल्प करे छे. तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघनस्वभावथी भ्रष्ट थयो थको वारंवार अनेक शुभाशुभ रागना विकल्परूपे परिणमतो ते कर्ता प्रतिभासे छे.
द्वेषमां क्रोध अने मान समाय छे अने रागमां माया अने लोभ आवी जाय छे. पोताना चैतन्यस्वरूपने भूलीने रागमां तन्मय थाय तेने आत्मा प्रति द्वेष-क्रोध छे. जे स्वभावद्रष्टिथी खाली छे अने शुभरागनी द्रष्टिथी सहित छे तेणे पोताने कषायरूप करी दीधो छे. स्वपरने एकपणे माननारो ते हुं क्रोध छुं, मान छुं, माया छुं, लोभ छुं, देह छुं, रूपाळो छुं, गोरो छुं, धोळो छुं इत्यादि पर वस्तुमां आत्मविकल्प करे छे. अने तेथी सच्चिदानंदस्वरूप भगवान आत्माथी भ्रष्ट थयो थको ते अनेक विकल्परूपे परिणमतो ते ते विकल्पनो कर्ता थाय छे.
भगवान आत्मा निर्विकल्प, अकृत्रिम, विज्ञानघनस्वभावरूप छे. तथा रागने पोतानो जे माने ते निज निर्विकल्प विज्ञानघनस्वभावथी भ्रष्ट छे. शुभरागना क्रियाकांडथी धर्म थाय एम माने ते भगवान चैतन्यस्वभावी आत्माथी भ्रष्ट छे. धर्म वस्तु बहु सूक्ष्म छे भाई! अहा! जैनदर्शनमां सम्यग्दर्शन शुं छे एनी लोकोने खबर नथी. सम्यग्दर्शन विना ज्ञान अने चारित्र होतां नथी. आत्मा अने अनात्माना भेदज्ञान विना समस्त क्रियाकांड अर्थहीन छे, दुःखनो आकुळतानो स्वाद उपजावनारा छे. भाई! क्रियाकांडथी धर्म थाय ए मान्यता हवे जवा दे अने स्वभावसन्मुखतानो पुरुषार्थ कर. अरे भाई! जन्ममरणनो अंत लाववानी आ वात छे.
प्रश्नः– कळशटीकामां (चोथा कळशमां) तो एम कह्युं छे के-‘काळलब्धि विना करोड उपाय जो करवामां आवे तोपण जीव सम्यक्त्वरूप परिणमनने योग्य नथी एवो नियम छे. आथी जाणवुं के सम्यक्त्ववस्तु यत्नसाध्य नथी, सहजरूप छे.’
उत्तरः– भाई! त्यां कळशटीकामां काळलब्धिनी मुख्यताथी वात करी छे. पण एनो अर्थ शुं? एनो अर्थ ए छे के स्वभावसन्मुख थवानो पुरुषार्थ करे अने स्वानुभव प्रगट करे त्यारे काळलब्धि पाकी एवुं साचुं ज्ञान थाय छे. स्वभावनुं भान प्रगट थाय त्यारे ते समयनी काळलब्धिनुं पण ज्ञान यथार्थ थाय छे. भाई! जे स्वभाव-सन्मुखनो पुरुषार्थ करे तेने काळलब्धि पाकी गई छे. श्री मोक्षमार्गप्रकाशकमां पण ए ज कह्युं छे के ‘जे जीव श्री जिनेश्वरना उपदेश अनुसार पुरुषार्थपूर्वक मोक्षनो उपाय करे छे तेने तो काळलब्धि वा भवितव्य पण थई चूकयां.’ जे पुरुषार्थ वडे मोक्षनो उपाय करे छे तेने तो सर्व कारणो मळे छे अने अवश्य मोक्षनी प्राप्ति थाय छे एवो निश्चय करवो.’ श्रीमद् राजचंद्रे पण कह्युं छे के- ‘भवस्थिति आदि नाम लई, छेदो