Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प नहि आत्मार्थ.’ खाली काळलब्धि, काळलब्धि-एम धारणानी वात करे एने काळलब्धिनुं साचुं ज्ञान नथी.

प्रश्नः– भगवान केवळीए दीठुं होय त्यारे सम्यग्दर्शन थशे ए वात शुं बराबर नथी?

उत्तरः– भगवान केवळीए दीठुं होय त्यारे सम्यग्दर्शन थशे एम तुं कहे छे पण एक

समयमां त्रणकाळ त्रणलोकने जाणे एवी केवळज्ञाननी पर्यायनो तने स्वीकार छे? जो केवळज्ञाननी सत्तानो स्वीकार छे तो कोनी सन्मुख थई ए स्वीकार कर्यो छे; द्रव्यस्वभावनी के पर्यायनी? पर्याय उपर द्रष्टि करतां तेनी सत्तानो स्वीकार थतो नथी केमके वर्तमान पर्याय अल्पज्ञ छे. तेनो स्वीकार द्रव्यसन्मुख द्रष्टि करतां थाय छे केमके द्रव्यस्वभाव ज्ञ-स्वभाव सर्वज्ञस्वभावरूप छे. अहो! ज्ञ-स्वभावी-केवळज्ञानस्वभावी आत्मा अंतरंगमां प्रत्यक्ष प्रगट छे तेनी सन्मुख द्रष्टि करतां पोताना सर्वज्ञस्वभावनी प्रतीति सहित सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे अने ए ज अपूर्व पुरुषार्थ छे; एने ज केवळज्ञाननी सत्तानो यथार्थ निर्णय थाय छे. (पर सन्मुखताथी केवळज्ञाननी सत्तानो सम्यक् निर्णय थतो नथी). प्रवचनसार गाथा ८०मां पण एम ज कह्युं छे के-

‘‘जो जाणदि अरहंतं द्रव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं’’

जे अरहंतनां द्रव्य-गुण-पर्यायने जाणे छे तेनी परिणति पोताना शुद्ध द्रव्यस्वभावमां -ज्ञस्वभावमां झुकी जाय छे अने तेनो मोह नाश पामे छे अर्थात् ते सम्यग्दर्शनने प्राप्त थाय छे. भाई! पोताना शुद्ध चैतन्यस्वभावनी द्रष्टिपूर्वक ज केवळज्ञाननी सत्तानो सम्यक् निर्णय थाय छे अने ए ज सम्यक् पुरुषार्थ छे.

अहीं कहे छे के हुं सर्वज्ञस्वभावी ज्ञाताद्रष्टा शुद्ध चैतन्यस्वभावमय आत्मा छुं ए वातने अज्ञानी भूली गयो छे अने तेथी पोताना विज्ञानघनस्वभावथी भ्रष्ट थईने वारंवार अनेक विकल्परूपे परिणमतो थको ते विकारनो कर्ता प्रतिभासे छे. आ अज्ञानीनी वात करी. हवे गुलांट खाईने द्रव्यद्रष्टि वडे जेणे सम्यग्दर्शन प्रगट कर्युं छे एवा ज्ञानीनी वात करे छे-

‘अने ज्यारे आत्मा ज्ञानी थाय त्यारे, ज्ञानने लीधे ज्ञाननी आदिथी मांडीने पृथक् पृथक् स्वादनुं स्वादन-अनुभवन होवाथी (अर्थात् पुद्गलकर्मना अने पोताना स्वादनुं-एकरूपे नहि पण-भिन्नभिन्नपणे अनुभवन होवाथी), जेनी भेदसंवेदनशक्ति ऊघडी गई छे एवो होय छे.’

पोते आत्मसन्मुख पुरुषार्थ करवाथी ज्ञानी थयो त्यारे तेने पृथक् पृथक् स्वादनुं स्वादन होय छे. कर्मे मार्ग आप्यो माटे ज्ञानी थयो छे एम नथी. पोताना शुद्ध