समयसार गाथा-९७ ] [ ७प चैतन्यस्वभावनी सन्मुखतानो पुरुषार्थ करीने ज्ञानी थयो छे. आ प्रमाणे आत्मज्ञान प्रगट थतां ज्ञानने लीधे ज्ञाननी आदिथी धर्मीने स्वभावना आनंदना स्वादनुं अने रागना कषायेला स्वादनुं पृथक् पृथक् एटले भिन्नभिन्न वेदन होय छे. स्वरूपनुं संवेदन थतां सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. एवो समकिती ज्ञानी छे. ते ज्ञानी ज्ञानने लीधे विकारना विरस स्वादनो अने चैतन्यना आनंदना स्वादनो पृथक् पृथक् अनुभव करे छे, केमके तेने भेदसंवेदनशक्ति ऊघडी गई छे.
कोई एम कहे के ज्ञानीने दुःखनुं वेदन छे ज नहि तो ते वात बराबर नथी. (भूमिका अनुसार) ज्ञानीने ज्ञाननुं-आनंदनुं वेदन छे अने रागनुं-दुःखनुं पण वेदन छे. जेटलो राग छे तेटलुं दुःखनुं वेदन छे. बन्नेनुं पृथक् पृथक् वेदन होय छे, एकरूप नहि. द्रव्यानुयोगमां अध्यात्मतत्त्वनी मुख्यताथी निरूपण होय छे. ज्यां द्रष्टिना विषयनुं निरूपण होय त्यां ज्ञानीने आनंदनुं वेदन छे एम कहेलुं होय छे. त्यां राग गौण छे. परंतु ज्यां ज्ञाननी प्रधानताथी वात होय त्यां एम कहे के ज्ञानीने ज्ञाननुं-आनंदनुं अने रागनुं पृथक् पृथक् वेदन होय छे.
-जुओ, केवळीने एकला ज्ञान अने आनंदनुं वेदन होय छे, -मिथ्याद्रष्टि अज्ञानीने एकला राग अने दुःखनुं वेदन होय छे, -अने समकिती ज्ञानीने ज्ञाननो अने रागनो भिन्न भिन्न स्वाद होय छे. ज्यारथी सम्यग्दर्शन-ज्ञान थयां त्यारथी ज्ञानी स्वरूपसंवेदनथी प्राप्त आनंदनो स्वाद अने पर्यायमां जे अल्प राग छे तेनो स्वाद पृथक् पृथक् अनुभवे छे. एक समयमां बेनो भिन्न भिन्न स्वाद ज्ञानी अनुभवे छे. अहाहा...! ज्यां सुधी पूर्ण वीतरागता अने पूर्ण आनंदनी प्राप्ति न थाय त्यां सुधी वीतराग परिणतिथी प्राप्त आनंदनी साथे जेटलो राग छे तेटला दुःखनुं पण भिन्नपणे ज्ञानीने अनुभवन होय छे. ज्ञानीने एकला आनंदनो ज स्वाद होय छे एम नथी.
ज्ञानीने सुख अने दुःख बन्नेनो पृथक् पृथक् स्वाद होय छे. भाई! आ वीतरागनो मार्ग छे. एमां कल्पनानी वात न चाले. न्यालचंदभाई सोगानीजीए शुभभावनो स्वाद भट्ठी समान कह्यो छे. चोथा गुणस्थाने समकितीने मिथ्यात्व अने अनंतानुबंधीनो अभाव थयो एटलो आनंद छे अने त्रण कषाय जे बाकी छे एटलुं दुःख पण छे. बन्नेनो स्वाद एने पृथक् पृथक् होय छे. तेवी रीते पंचम गुणस्थानवाळाने जेटली वीतराग परिणति थई छे तेटलो ज्ञाननो सुखरूप अने आनंदरूप स्वाद छे अने ते ज समये जे बे कषाय विद्यमान छे तेटलो रागनो दुःखरूप स्वाद छे. बन्नेनुं भिन्न भिन्न अनुभवन होय छे. एक समयमां शान्ति पण वेदे छे अने जेटलो राग बाकी छे तेटलुं दुःख पण पृथक्पणे वेदे छे. अहो! वीतरागनो मार्ग खूब गंभीर छे!