७६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प
भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे पंचम आरामां तीर्थंकर जेवुं काम कर्युं छे. अने अमृत- चंद्राचार्यदेवे एमना गणधर जेवुं काम कर्युं छे. मूळ गाथासूत्रोनां गंभीर रहस्यो टीका द्वारा खुल्लां कर्यां छे. कहे छे-धर्मीने ज्ञान अने रागनुं पृथक् पृथक् अनुभवन होवाथी, जेनी भेदसंवेदनशक्ति ऊघडी गई छे एवो होय छे. ज्ञाननुं वेदन अने रागनुं वेदन ए बन्नेनो भेद-विवेक करवानी शक्ति ज्ञानीने प्रगट थई गई छे. अहाहा...! आ टीका तो देखो! अमृतचंद्रे एकलां अमृत वहेवडाव्यां छे! रागनो स्वाद दुःखरूप होय छे अने स्वरूपसंवेदन वडे प्राप्त ज्ञाननो स्वाद सुखरूप होय छे-एम बेना स्वादने भिन्न करवानी भेदसंवेदनशक्ति जेने खीली गई छे एवो ज्ञानी होय छे. अहाहा...! दिगंबर संतोए जगतने शुं न्याल करी दीधुं छे!
अरे भाई! आ वातने सांभळवामां पण ऊंचां पुण्य बंधाई जाय छे. आवी परम सत्य वात धीरजथी वारंवार सत्समागमे सांभळे तो शुभभावना निमित्ते तेने ऊंचां पुण्य बंधाय छे जेना फळरूपे बाह्य लक्ष्मी आदि वैभव प्राप्त थाय छे.
प्रश्नः– आप आ जादुई लाकडी फेरवो छो तेनाथी पैसा वगेरे सामग्री मळे छे एम लोको कहे छे ए शुं साचुं छे?
उत्तरः– ना; लाकडीथी कांई मळतुं नथी. वीतरागदेवनी आ परम सत्य वाणी छे ते सांभळनारने शुभभावथी ऊंचां पुण्य बंधाई जाय छे. वळी कोई पूर्वनां पापकर्म संक्रमित थईने आ भवमां उदयने प्राप्त थई जाय तो पुण्यना निमित्ते अनुकूळ बाह्य सामग्री सहेजे मळी जाय छे. बाकी ईलमनी लकडी-बकडी एवुं कांई अहीं छे नहि. एकवार आवी एक लाकडी चोराई गई हती. ए लाकडीमां शुं माल छे? माल तो भगवान आत्मा शुद्ध चिदानंदमय वस्तुमां छे. ए परमानंदना नाथ प्रभु आत्मानी आ परम सत्य वात काने पडतां पुण्यानुबंधी पुण्य बंधाई जाय छे. तेना फळमां लक्ष्मी आदि बाह्य वैभव मळे छे, पण ते कोई चीज नथी. अहाहा...! रागथी भिन्न पडीने आत्माना स्वानुभवमंडित आनंदनो अनुभव करवो ए चीज छे.
अहो! कुंदकुंदाचार्यदेवनी कथनपद्धति अलौकिक छे. कविवर वृंदावनजीए तो कह्युं छे के-
कुंदकुंदाचार्यदेव साक्षात् सदेहे भगवान पासे विदेहक्षेत्रमां गया हता. श्रुतकेवळीओ साथे चर्चा करी हती. भगवाननी वाणी सवारे, बपोरे, सांजे छ छ घडी नीकळे तेनुं श्रवण कर्युं हतुं. पछी भरतमां पधारीने पांच परमागमोनी रचना करी छे. तेओ विदेहमां गया हता ए सत्य वात छे. एमां रंचमात्र पण शंकाने स्थान नथी.