समयसार गाथा-९७ ] [ ७७
ज्ञानीने भेदसंवेदननी शक्ति ऊघडी गई छे; तेथी ते जाणे छे के ‘‘अनादिनिधन, निरंतर स्वादमां आवतो, समस्त अन्य रसथी विलक्षण (भिन्न), अत्यंत मधुर जे चैतन्यरस ते ज एक जेनो रस छे एवो आ आत्मा छे अने कषायो तेनाथी भिन्न रसवाळा (कषायला- बेस्वाद) छे; तेमनी साथे जे एकपणानो विकल्प करवो ते अज्ञानथी छे.’’
भगवान आत्मा आनंदरसकंद छे. तेनां प्रतीति अने ज्ञान थतां शक्तिरूप जे आनंद अंदर छे तेनो अंश व्यक्त थाय छे अने आनंदनो अनुभव थाय छे. ते धर्मीने आत्माना आनंदनो अनुभव अने रागना कलेशनो अनुभव बन्ने एकसाथे पृथक् पृथक् छे. आत्मानो चैतन्यरस रागना रसथी विलक्षण छे एम ते जाणे छे. धर्मीने रागनो स्वाद अने पोतानो स्वाद बेने भिन्न करवानी भेदविज्ञाननी शक्ति प्रगटी होय छे. ज्यारे अज्ञानी रागनो स्वाद अने पोतानी पर्यायनो स्वाद एकमेक माने छे. अगियार अंग अने नवपूर्वना ज्ञाननी लब्धि प्रगटी होय, पण ज्यां सुधी रागनो स्वाद अने पोतानो स्वाद-ए बन्नेनो स्वाद एक भासे त्यां सुधी ते मिथ्याद्रष्टि छे.
ज्यारथी ज्ञान प्रगट थाय छे त्यारथी आनंदनो स्वाद आवे छे. समकितीने बधा गुणनी एक समयमां अंशे निर्मळ पर्याय प्रगट थाय छे. श्रीमदे कह्युं छे के ‘सर्वगुणांश ते समकित.’ मोक्षमार्गप्रकाशकमां रहस्यपूर्णचिठ्ठीमां कह्युं छे के-‘‘चोथा गुणस्थानवर्ती आत्माने ज्ञानादि गुणो एकदेश प्रगट थया छे.’’ आत्माने संख्याए अनंत गुण छे. ते बधा गुणोनी शुद्ध पर्याय प्रगट थाय छे. सर्वगुणोनो अंश प्रगट वेदनमां आवे तेनुं नाम सम्यग्दर्शन छे.
रहस्यपूर्णचिठ्ठीमां आवे छे के-‘‘वळी भाईश्री! तमे त्रण द्रष्टांत लख्या अथवा द्रष्टांत द्वारा प्रश्न लख्या, पण द्रष्टांत सर्वांग मळतां आवे नहि. द्रष्टांत छे ते एक प्रयोजन दर्शावे छे. अहीं बीजनो चंद्र, जळबिंदु, अग्निकण ए द्रष्टांत तो एकदेश छे अने पूर्णिमानो चंद्र, महासागर तथा अग्निकुंड ए सर्वदेश छे; ए ज प्रमाणे चोथा गुणस्थानवर्ती आत्माने ज्ञानादि गुणो एकदेश प्रगट थया छे तेनी तथा तेरमा गुणस्थानवर्ती आत्माने ज्ञानादि गुणो सर्वदेशरूप प्रगट थया छे तेनी एक ज जाति छे. (एम समजवुं).’’
थोडा प्रदेश सर्वथा निर्मळ थई जाय एम नहि परंतु सर्व प्रदेशमां एक अंश निर्मळ थाय छे. चोथा गुणस्थानमां ज्ञानादि गुणो एकदेश प्रगट थई जाय छे अने तेरमा गुणस्थाने सर्वदेशरूप प्रगट थई जाय छे. आत्मामां अनंत गुणो छे. सम्यग्दर्शन थतां तेनी प्रतीति थई त्यां जेटला गुण छे ते बधानो एक अंश पर्यायमां प्रगट अनुभवमां आवे छे. तेथी ते जाणे छे के-‘अनादिनिधन, निरंतर स्वादमां आवतो समस्त अन्यरसथी विलक्षण, अत्यंत मधुर जे चैतन्यरस ते ज एक जेनो रस छे