Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प एवो आ आत्मा छे अने कषायो तेनाथी भिन्न रसवाळा छे; तेमनी साथे जे एकपणानो विकल्प करवो ते अज्ञानथी छे.’

अनादिनिधन निरंतर स्वादमां आवतो चैतन्यरस समस्त अन्यरसथी विलक्षण छे. अहीं आ पर्यायनी वात छे हों. आत्मा प्रभु आनंदनो रसकंद छे. तेनी सन्मुखता करवाथी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान प्रगट थाय छे. ते समकितीने भेदज्ञाननी शक्ति प्रगटी गई छे तेथी ते रागनो स्वाद अने पोतानो स्वाद भिन्न भिन्न जाणे छे. अहीं तो स्वादनी मुख्यताथी वात करी छे. बाकी तो चोथा गुणस्थाने आत्मामां जे अनंत गुणो छे ते बधा गुणोनी एक समयनी पर्यायमां एक अंश प्रगट थाय छे.

मार्ग आवो छे, पण रुचे नहि एटले केटलाकने एम लागे के आ वळी नवो पंथ नीकळ्‌यो! पण आ नवो पंथ नथी. बापु! भगवान सर्वज्ञदेवनी परंपराथी चाल्यो आवतो आ ज एक मार्ग छे. कहे छे-चैतन्यरस, अन्यरसथी विलक्षण एवो अत्यंत मधुर रस, अमृतमय रस छे. अनुभवमां स्वादनी मुख्यता छे. श्री दीपचंदजीनो ‘अनुभव प्रकाश’ नामनो ग्रंथ छे. त्यां पण अनुभवना स्वादनी वात करी छे. स्वरूपनुं सत्यज्ञान -सम्यग्ज्ञान प्रगट थाय तेने पोताना चैतन्यना आनंदनो स्वाद प्रत्यक्ष भासे छे. अहाहा...! आवो मधुर चैतन्यरस ए एक ज जेनो रस छे एवो आत्मा छे-एम ज्ञानी जाणे छे. ज्ञान विशेष होय के न होय, तेनी साथे संबंध नथी. पण आत्मानो अनुभव थतां आनंदनो स्वाद आवे ए मुख्य चीज छे. बनारसीदासे कह्युं छे ने के-

‘रस स्वादत सुख ऊपजै, अनुभव ताको नाम.’

अरे भाई! आवा आनंदना स्वाद पासे इन्द्रनां इन्द्रासन अने भोग अने चक्रवर्तीनो वैभव सडेला घासना तरणा जेवां भासे छे. समकिती इन्द्रने इन्द्राणीना भोग सडेला मडदा जेवा भासे छे. ज्ञानीने राग आवे छे पण एमां एने दुःखनो स्वाद प्रतीत थाय छे. ज्ञानीने विषयवासनानो जे राग आवे छे ते काळा नाग जेवो देखाय छे. अज्ञानीने जेमां सुख भासे छे ते विषयभोगो ज्ञानीने रोग जेवा भासे छे. सम्यग्ज्ञान कोने कहेवाय भाई? ए कांई बहारनी पंडिताईथी मळे एवी चीज नथी.

अहाहा...! अत्यंत मधुर रस ते एक ज जेनो रस छे एवो आत्मा छे अने कषायोनो तेनाथी भिन्न कषायलो स्वाद छे-एम ज्ञानीने भासे छे. शुभाशुभ रागनो आकुळतामय स्वाद छे. चैतन्यरसथी एनो रस भिन्न बेस्वाद-विरस छे. सोगानीजीने लख्युं छे के-शुभराग तो धधक्ती भट्ठी समान लागे छे. अरे! कोईने आ वात ठीक न पडे तो शुं थाय? अहीं तो चोकखे-चोकखी वात छे के शुभभाव हो के अशुभभाव हो-ए बधो कषायलो कलुषित रस छे.

भाई! एक सेकन्डनो धर्म प्रगटे ए पण कोई अलौकिक चीज छे. अहा! जेनी पूर्वे कदीय सूझ पडी नथी, जेनुं पूर्वे कदीय ज्ञान थयुं नथी एवी आ अपूर्व वात छे.