समयसार गाथा-९७ ] [ ७९ पूर्वे सांभळवा मळ्युं पण स्वभाव तरफ द्रष्टि कदी करी नहि! रागनी साथे एकत्व मानी विकल्प कर्या, पण ए तो अज्ञान छे. अत्यंत मधुररस, चैतन्यरस ते पोतानी चीज छे तेनी साथे रागना कलुषित भावनुं एकत्व करवुं ते अज्ञान छे एम ज्ञानी जाणे छे.
जुओ, सर्वज्ञ परमात्मा अरहंतदेवने ज्ञाननी दशा परिपूर्ण खीली गई छे. तेओ एक समयनी ज्ञाननी अवस्था जे केवळज्ञान ते वडे त्रणकाळ त्रणलोकने युगपत् जाणे छे एम कहेवुं ए असद्भूत व्यवहारनय छे, केमके भगवानने जे ज्ञान प्रगट थयुं ते पोताथी प्रगट थयुं छे, लोकालोकथी नहि. ए रीते भगवानने दर्शन, सुख, वीर्य इत्यादि अनंतचतुष्टय प्रगट थई गया छे. शक्तिरूपे तो अनंतचतुष्टय सर्व जीवोमां छे. परंतु शक्तिनी परिपूर्ण व्यक्ति पर्यायमां जेने थाय ते सर्वज्ञ छे; तथा शक्तिनी पर्यायमां एकदेश व्यक्ति थाय एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे.
सम्यग्दर्शन थतां समकितीने अनंतगुणोनो अंश पर्यायमां व्यक्त थाय छे. तेमां आनंदनुं वेदन मुख्य छे एनी अहीं वात छे. सम्यग्द्रष्टिने परमांथी सुखबुद्धि ऊडी गई छे. इन्द्रना इन्द्रासनमां के चक्रवर्तीना बाह्य वैभवमां समकितीने सुखबुद्धि नथी. चक्रवर्तीने ९६००० राणीओ होय छे. तेमां तेनी जे पट्टराणी छे तेनी एक हजार देवो सेवा करे छे. तेना प्रति कमजोरीथी विषयनो राग आवे छे पण समकितीने ते काळकूट झेर समान भासे छे. अहाहा...! निज चैतन्यरसना आनंदना अमृतमय स्वादनी पासे ज्ञानीने रागनो स्वाद झेर जेवो भासे छे. पोताना आनंदना स्वाद साथे रागना स्वादना एकत्वनो विकल्प करवो ए अज्ञानथी छे एम ज्ञानी यथार्थ जाणे छे.
जेम मण दुधपाकमां झेरनी एक झीणी कणी पडी जाय तो बधो दुधपाक झेर थई जाय. एमांथी मीठा दूधनो स्वाद न आवे पण झेरनो स्वाद आवे. तेम आत्मा आनंदनो नाथ नित्यानंदस्वरूप चैतन्य प्रभु छे. तेना आनंदना परिणाम साथे रागनुं थोडुं झेर पडे तो आनंदनुं उलटुं परिणमन थई जाय. एमांथी आनंदनो स्वाद न आवे पण रागनो कषायलो कलुषित स्वाद ज आवे. परंतु धर्मी तो एम जाणे छे के अत्यंत मधुर अमृतमय आनंदनो रस ते मारो रस छे अने रागनो कलुषित रस ते मारी चीज नथी, ए तो पुद्गलनो रस छे. धर्मी ज्ञानना स्वादथी रागनो स्वाद भिन्न पाडी दे छे. ते जाणे छे के पोताना ज्ञानना-चैतन्यना स्वादनी साथे रागना स्वादना एकपणानो विकल्प करवो ते अज्ञान छे. अहो! आ वीतरागनो मार्ग ए शूरानो मार्ग छे. कह्युं छे ने के-
अहाहा...! पोताना शुद्ध चैतन्यस्वभावनी समीप जईने भेटो करतां अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आवे एवो परमात्मा प्रभु पोते छे. आवा शुद्ध चिदानंदरसनो आस्वादी