Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-प धर्मी जाणे छे के आनंदनी साथे रागने भेळववो, बन्नेना एकपणानो विकल्प करवो ते अज्ञानथी छे. आ रीते परने अने पोताने भिन्न जाणे छे. धर्मी जीव स्वपरने भिन्न जाणे छे; रागने अने ज्ञानने भिन्न जाणे छे.

हवे कहे छे-‘तेथी अकृत्रिम (नित्य), एक ज्ञान ज हुं छुं परंतु कृत्रिम (अनित्य), अनेक जे क्रोधादिक ते हुं नथी एम जाणतो थको ‘‘हुं क्रोध छुं’’ इत्यादि आत्मविकल्प जरापण करतो नथी; तेथी समस्त र्क्तृत्वने छोडी दे छे.’

आ शुभाशुभ राग छे ते कृत्रिम, अनित्य अने दुःखरूप छे अने हुं तो अकृत्रिम, नहि करायेली एवी त्रिकाळी सत्त्वरूप नित्य चीज छुं, अहाहा...! एक ज्ञान ज हुं छुं. आ पलटती पर्याय ते हुं नहि एम ज्ञानी जाणे छे. हुं तो अकृत्रिम त्रिकाळी ध्रुव एक ज्ञायक तत्त्व छुं. आ ज्ञानना जे भेद पडे ते मारी चीज नथी. आवा शुद्ध ज्ञायकरूप परमात्माने अंतरंगमां अनुभवे तेनुं नाम धर्म छे.

सर्वज्ञदेव अरिहंत परमात्मानुं आ कथन छे. ते अनादिथी आचार्यो कहेता आव्या छे. भाई! तने खबर नथी एटले नवुं लागे छे पण आ नवुं नथी. आ तो असली पुराणी चाली आवती वात छे. कहे छे-अकृत्रिम एक ज्ञान ज हुं छुं अने कृत्रिम क्रोध, मान, माया, लोभ, पुण्य, पाप आदिना अनेकरूप विकल्प ते हुं नथी एम धर्मी जाणे छे. आ प्रमाणे जाणतो ज्ञानी हुं क्रोध छुं, मान छुं, माया छुं, लोभ छुं इत्यादि किंचित्मात्र विकल्प करता नथी; तेथी समस्त र्क्तृत्वने छोडी दे छे. रागादि जे विकल्प थाय तेनो हुं जाणनार मात्र छुं, कर्ता नहि-एम सकल र्क्तृत्वने छोडी दे छे.

हवे कहे छे-‘तेथी सदाय उदासीन अवस्थावाळो थयो थको मात्र जाण्या ज करे छे; अने तेथी निर्विकल्प, अकृत्रिम, एक विज्ञानघन थयो थको अत्यंत अकर्ता प्रतिभासे छे.’

परनो कर्ता अज्ञानथी छे एम जाणे ते रागने छोडी दे छे. रागथी भिन्न निज चैतन्यस्वरूपनुं भान थतां समस्त र्क्तृत्वने छोडी दे छे. तेथी सदाय उदासीन अवस्थावाळो थयो थको मात्र जाण्या ज करे छे. अहाहा...! ज्ञाताद्रष्टा रहेतो थको दया, दान आदि विकल्पनो ज्ञानी कर्ता थतो नथी. हुं दया करुं छुं, हुं दान करुं छुं-एम दया, दानना विकल्पनो ते कर्ता थतो नथी. मात्र जे अल्प कषाय छे तेने ते जाण्या ज करे छे अने स्वरूपस्थिरता वधारीने तेनो पण अभाव करी दे छे. अहाहा...! आनुं नाम सम्यग्दर्शन अने धर्म छे.

घरबार, कुटुंब, बैरां-छोकरां ए बधां पोतानां छे एम मानीने अज्ञानी चोफेर घेराई गयो छे. अरे भाई! कोई जीव कयांयथीय आव्यो अने कोई कयांयथी आव्यो. तेमने एकबीजा साथे खरेखर कांई संबंध नथी. पत्नीनो जीव आव्यो होय तिर्यंचमांथी अने पतिनो जीव आव्यो होय स्वर्गथी. बे थई गया भेगा त्यां माने के ‘मारी पत्नी’